बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 343, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने दशमोऽध्यायः २९१
मन से अघमर्षण सूक्त का जप करते हुए सोलह प्राणायाम करे, किनारे पर आकर वस्त्रों को निचोड़कर दूसरे शुद्ध वस्त्रों को पहने और फिर आचमन करे। 'ओं सुर्भुव स्सुवः' कहकर जल पवित्र ग्रहण करे। 'ओं भूस्तर्पयामि' ओं भुवस्तर्पयामि ओं सुव-स्तर्पयामि ओं महस्तर्पयामि ओं जनस्तर्पयामि ओं' तपस्तर्पयामि 'ओं सत्यं तर्पयामि' कहकर तर्पण करे ॥ ३३ ॥
आश्रमन्तरसाधारणविहितानां स्नानादीनामनुक्रमणं षोडशप्राणायामाना-मपि विधानार्थं तर्पणान्तरविधानार्थं च । तर्पणञ्च जलपवित्रनिस्स्रुतेन जलेन ॥ ३३ ॥
पितृभ्योऽञ्जलिमुपादाय ओं भूस्स्वधों भुवस्स्वधों सुवस्स्वधों भूर्भु-वस्सुवर्महर्नम इति ॥ ३४ ॥
अनु०—पितरों के लिए अंजलि भर जल लेकर 'ओं भूस्स्वधा ओं भुवस्स्वधा ओं सुवस्स्वधा' 'ओं भूर्भुवस्सुवर्महर्नमः' कहकर तर्पण करे।
टि०—यह तर्पण उसी प्रकार होता है जिस प्रकार देवों के लिए तर्पण किया जाता है अर्थात् प्राचीनावीती न होवे ।
तर्पयतीति प्रकृतम् । देववदिति प्राचीनावोतनिवृत्त्यर्थम् । मन्त्रा अपि स्व-धाकरणमात्राः, न चतुर्थीनमस्कारान्ताः ॥ ३४ ॥
एवं तर्पणे कृते—
अथो ऽदुत्यं चित्रमिति द्वाभ्यामादित्यमुपतिष्ठते ॥ ३५ ॥
अनु०—इसके बाद 'उदुत्यं चित्रम्' आदि दो मन्त्रों से सूर्य की पूजा करे ॥ ३५ ॥
एतदपि वैशेषिकमुपस्थानम् ॥ ३५ ॥
ओमिति ब्रह्म ब्रह्म वा एष ज्योतिः य एष ज्योतिः य एष तर्पत्यैष वेदा य एव तर्पयति वेद्यमेवैतद्य एष तर्पयति एवमेवैष आत्मानं तर्प-यत्यात्मने नमस्करोत्यात्मा ब्रह्माऽऽत्मा ज्योतिः ॥ ३६ ॥
अनु०—'ओम्' अक्षर ब्रह्म है, ब्रह्म ही यह ज्योति है, जो यह ज्योति है जो तर्पण करता है वही जानता है जो तर्पण करता है। यह जानने योग्य है जो तर्पण करता है इस प्रकार वह अपना ही तर्पण करता है। इस प्रकार वह अपना ही तर्पण करता है, अपने को ही नमस्कार करता है आत्मा ही ब्रह्मा है, आत्मा ही ज्योति है।
१. मन्त्रद्वयमिदं १६० पृष्ठे टिप्पण्यां द्रष्टव्यम् ॥