बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 352, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३०० | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ संन्यासिनियमः |
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शपं ग्रहणम् । शरणं परानुग्रहः । उक्तं च 'हिंसाऽनुग्रहयोरनारम्भी' इति । इतिशब्द एवंप्रकाराणां ग्रहणार्थः । कथंप्रकाराणाम् ?
न शब्दशास्त्राभिरतस्य मुक्तिर्न लोकचित्तग्रहणे रतस्य ।
न भोजनाच्छादनतत्परस्य न चैव रम्यावसथप्रियस्य ॥
इत्यादीनाम् ॥ २५ ॥
भैक्षार्थी ग्राममन्विच्छेत् ॥ २६ ॥
अनु०—भिक्षा के लिए ही गाँव में प्रवेश करे ॥ २६ ॥
भैक्षशब्दो जलपवित्रादेरपि प्रदर्शनार्थः ॥ २६ ॥
स्वाध्याये वाचमुत्सृजदिति ॥ २७ ॥
अनु०—वेद के स्वाध्याय के समय ही बोले ॥ २७ ॥
स्वाध्यायः प्रणवः समस्तवेदो वा ॥ २७ ॥
विज्ञायते च—परिमिता वा ऋचः परिमितानि सामानि परिमितानि यजूंष्यथैतस्यैवान्तो नाऽस्ति यद्ब्रह्म तत्प्रतिगृणत आचक्षीत स प्रतिगर इति ॥ २८ ॥
अनु०—वेद से यह ज्ञात होता है कि ऋचाओं की संख्या सीमित है, सामों की संख्या परिमित है, यजुस् की संख्या परिमित है किन्तु उसका अन्त नहीं है जिसे ब्रह्म कहते हैं, उसी के संबन्ध में अध्वर्यु कहते हैं और वही प्रतिगर है ॥ २८ ॥
टि०—इस सूत्र का मन्तव्य कुछ अस्पष्ट है । गोविन्द स्वामी की व्याख्या के अनुसार भाव यह है कि ऋक् आदि मन्त्र परिमित हैं किन्तु चतुर्होत्र नाम के ब्रह्म का अन्त नहीं है । अतएव अध्वर्यु उसी का विवेचन करते हैं, जिस प्रकार मानस का प्रणव प्रतिगर है उसी प्रकार मौन रहने वाले संन्यासी के लिए प्रणव हीं स्वाध्याय है । संन्यासी के लिए स्वाध्याय प्रणव तक भी सीमित हो सकता है । अध्वर्यु का प्रतिगर है 'ओं होत:' । यह अंश तैत्तिरीय ब्राह्मण २.२.१.४ तथा १.१२.५.१ की ओर निर्देश करता है ।
'अस्ति द्वादशाहे दशमेऽहनि मानसे ग्रहे चातुर्होत्रविधानं 'अथ ब्रह्म
१. अयमत्र सारः—
अस्ति द्वादशाहो नाम द्वादशसुत्याकषट्त्रिंशद्दिनसाध्यस्तोमयागः । तत्र दशमे ( सुत्या ) दिवसे प्रजापतिदेवताको मन्त्रोच्चारणं विना मनसैव सर्वमुक्तवाऽनुष्ठेयो मानसो नाम ग्रहविशेषः । तत्र चतुर्होतृमन्त्रस्यापि विधानमस्ति । ( पृथिवी होता ।