बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 356, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३०४ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ वृत्त्युपायाः |
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अनेन वृत्तिशब्दो व्युत्पाद्यते। तेषां शालीनयायावराणां तद्वर्तनात् तस्य शरोरस्य वर्तनात् दर्शितमेतदस्माभिः पूर्वसूत्रे ॥ २ ॥
शालाश्रयत्वाच्छालीनत्वम्। वृत्त्या वरया यातीति यायावरत्वम्। 'अनुक्रमचरणाच्चक्रचरत्वम् ॥ ३ ॥
**अनु०—**घर में निवास करने के कारण शालीन कहा जाता है। श्रेष्ठ वृत्ति द्वारा जीवन निर्वाह करने से यायावर कहलाते हैं। (वर्ण के) क्रम के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के घर वृत्ति के लिए जाने वाला चक्रचर कहलाता है ॥ ३ ॥
**टि०—**गोविन्द के अनुसार चक्रचर यायावर का ही नाम है। यायावर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के घर अनुक्रम से जाता है अर्थात् ब्राह्मण के यहाँ जाने पर वृत्ति न मिले तो क्षत्रिय के यहाँ जाता है, वहाँ भी वृत्ति न उपलब्ध होने पर वैश्य के यहाँ जाता है।
अन्वर्थसंज्ञा एताः। विस्तीर्णाभिः शालाभिर्युक्ताश्शालीनाः। यथा 'जानश्रुतिर्ह पौत्रायणः श्रद्धादेयो बहुदायी बहुपाकय आस। सह सर्वत आवसथान् मापायंचक्रे सर्वत एव मेऽन्नमत्स्यन्तीति'। तद्वदेतेऽपीति। खप्रत्ययो मत्वर्थीयः। अनुक्रमेण चरणमनुक्रमचरणम्। यायावारामेवैषा संज्ञा। अनुक्रमचरणं नाम विप्रक्षत्रियविशां गेहेषु पूर्वस्य पूर्वस्याऽभावे उत्तरोत्तरचरणम्। वृत्त्या वरया उत्कृष्टया यापयत्यात्मानमिति। णिचो लोपोऽत्र द्रष्टव्यः ॥ ३ ॥
ता अनुव्याख्यास्यामः ॥ ४ ॥
**अनु०—**हम उन वृत्तियों की क्रमशः व्याख्या करेंगे ॥ ४ ॥
क्रमेण ता वृत्तीः विविच्य व्याख्यास्यामः ॥ ४ ॥
षन्णिवर्तनी कौद्दाली ध्रुवा सम्प्रक्षालनी समूहा पालिनी सिलोञ्छा कापोता सिद्धेच्छेति नवैताः ॥ ५ ॥
**अनु०—**ये वृत्तियाँ नौ हैं—षन्णिवर्तनी, कौद्दाली, ध्रुवा, सम्प्रक्षालनी समूहा, पालिनी, सिलोञ्छा, कापोता, सिद्धेच्छा ॥ ५ ॥
एता अप्यन्वर्थसंज्ञा एव। एतासामेव रूपमुपरितनेऽध्याये स्वयमेव निपुणतरं विवरिष्यते ॥ ५ ॥
तासामेव वान्याऽपि दशमी वृद्धिर्भवति ॥ ६ ॥
१. अनुक्रमेण चरणात् इति आ. पु.