बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 357, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ३०५
अनु०—इनके अतिरिक्त वन में निवास कर जीविका निर्वाह करना दसवीं वृत्ति होती है ॥ ६ ॥
टि०—वान्या वृत्ति में जंगली फल-मूलों के आहार से ही जीविका-निर्वाह का विधान है।
वान्या वनसम्बन्धिनी वन्यधान्यमूलफलाहारेण वृत्तिः, यामेनां दशमीमित्याचक्षते साऽपि तासामेवान्यतमेत्याचार्याभिप्रायः । वान्यायाः पृथगुपादानमितराभ्यः प्राशस्त्यप्रतिपादनार्थम् ॥ ६ ॥
आ नववृत्तेः ॥ ७ ॥
अनु०—नौ वृत्तियों के अन्तर्गत किसी को ग्रहण करने की विधि इस प्रकार है॥७॥
नव वृत्तयो यस्य तस्याऽनुष्ठानं वक्ष्यत इति शेषः। आङत्राभिविधौ । अतश्च दशमीमाश्रितवतो वक्ष्यमाणो विधिर्न भवति ॥ ७ ॥
केशश्मश्रुलोमनखानि वापयित्वोपकल्पयते—कृष्णाजिनं कमण्डलुं यष्टिं वीवधं १कुथहारिमिति ॥ ८ ॥
अनु०—केश, दाढ़ी-मूंछ, शरीर के रोम और नखों को कटाकर इन वस्तुओं को तैयार करे—काला मृगचर्म, कमण्डलु, वीवध (बोझ उठाने का डण्डा या बहंगी) और कुथहारि या हंसिया ॥ ८ ॥
टि०—गोविन्दस्वामी ने 'कुथहारि' का अर्थ 'वासवशासनदात्रम्' किया है जो संभवतः एक विशेष प्रकार का हँसिया है, इसी प्रकार इति शब्द से कुद्दाल आदि अन्य आवश्यक वस्तुओं का ग्रहण भी किया जाना चाहिए।
उकल्पनमार्जनम्। वीबधो दृढदारुभयतशिशक्यम्। कुथहारिः वासवशासनदात्रम् (?)। इतिशब्दः कुद्दालादेर्वक्ष्यमाणस्योपलक्षणार्थः। एतानि नवानि भवेयुः ॥ ८ ॥
त्रैधातवीयेनेष्ट्वा प्रस्थास्यति वैश्वानर्या वा ॥ ९ ॥
अनु०—त्रैधातवीय या वैश्वानरी इष्टि कर घर से निकलने का विचार करे॥९॥
प्रस्थास्यति निर्गच्छति। आहिताग्नेर्गृहस्थस्य विधिः। इतरस्याऽपि तद्देवत्यश्चरुरिष्यते। एतत्पूर्वेद्युरेव कार्यम् ॥ ९ ॥
अथाऽन्येद्युः—
प्रातरुदित आदित्ये यथासूत्रमग्नीन् प्रज्वाल्य गार्हपत्य आज्यं
१. कुतपहारिमिति इ. ई. पुस्त.
२३ बौ०गृ०