बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 358, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३०६ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [वृत्त्युपायाः |
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विलाप्योत्पूय स्रुक्स्रुवं निष्टप्य सम्मृज्य स्रुचि चतुर्गृहीतं गृहीत्वाऽऽहवनीये वास्तोष्पतीयं जुहोति ॥ १० ॥
अनु०— दूसरे दिन प्रातः काल सूर्य के उगने पर अपने सूत्र के अनुसार अग्नि को प्रज्वलित करे, गार्हपत्य अग्नि पर घृत पिघलाए, कुश से उसे स्वच्छ करे, स्रुक् और स्रुवा को अग्नि पर तपाए, उन्हें पोंछ कर स्रुक् में चार बार घृत लेकर आहवनीय अग्नि में वास्तोष्पतीय हवन करे ॥ १० ॥
"१वास्तोष्पते प्रतिजानीह्यस्मा" निति पुरोनुवाक्यामनूच्य "२वास्तोष्पते शग्मया सꣳसदा ते" इति याज्यया जुहोति ॥ ११ ॥
अनु०— 'वास्तोष्पते प्रतिजानीह्यस्मान् स्वावेशो अनमीवो भवानः । यत्त्वे महे प्रतितन्नो जुषस्व शन्न एधि द्विपदे शं चतुष्पदे' । इस पुरोनुवाक्या का उच्चारण करने के बाद 'वास्तोष्पते शग्मया संसदा ते सक्षीमहि रण्वया गातुमत्या । आवः क्षेम उत योगे वरं नो यूयं पात स्वस्तिभिस्सदा नः' (तैत्तिरीय संहिता ३.४.१०) याज्या मन्त्र से अपने सूत्र के नियम के अनुसार हवन करे ॥ ११ ॥
यथासूत्रं आत्मीयशास्त्रानुसारेण वास्तोष्पतीयहोमो यागानुष्ठानम् । ऋज्वन्यत् ॥ ११ ॥
सर्व एवाऽऽहिताग्निरित्येके ॥ १२ ॥
अनु०— कुछ आचार्यों का मत है कि अग्नि का आधान करने वाले सभी व्यक्तियों के लिए यह होम है ॥ १२ ॥
अधिकारिनिर्देशः। त्रैधातवीयादेरविशेषेण सर्वस्याऽप्याहिताग्नेः प्रयाणे निमित्त एतदित्येकीयं मतम् ॥ १२ ॥
यायावर इत्येके ॥ १३ ॥
अनु०— अन्य आचार्यों का मत है कि यह होम कर्म केवल यायावर के लिए है ॥ १३ ॥
यायावरस्याऽऽहिताग्नेश्चेत्यपरम् ॥ १४ ॥
१. वास्तोष्पते प्रतिजानीह्यस्मान् स्वावेशो अनमीवो भवानः । यत्त्वे महे प्रतितन्नो जुषस्व शन्न एधि द्विपदे शं चतुष्पदे ॥
२. वास्तोष्पते शग्मया संसदा ते सक्षीमहि रण्वया गातुमत्या । आवः क्षेम उत योगे वरं नो यूयं पात स्वस्तिभिस्सदा नः ३॥ (तै. सं. ३.४.१०.)