बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 359, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ३०७
निर्गत्य ग्रामान्ते ग्रामसीमान्ते वाऽवतिष्ठते तत्र कुटीं मठं वा करोति कृतं वा प्रविशति ॥ १४ ॥
अनु०— घर से निकल कर ग्राम के छोर पर एक किनारे या गाँव की सीमा के अन्त स्थान पर रहे, वहीं कुटी या मठ बनावे अथवा यदि पहले से कुटी या मठ बना हो तो उसमें प्रवेश करे ॥ १४ ॥
ग्रामान्तो वास्तुसीमा । इतरा क्षेत्रसीमा । कुटी एकस्थूणमस्थूणं वा वेश्म । मठो बहुस्थूणः ॥ १४ ॥
कृष्णाजिनादीनामुपकॢप्तानां यास्मिन् यस्मिन्नर्थे येन येन यत्प्रयोजनं तेन तेन तत्कुर्यात् । प्रसिद्धमग्नीनां परिचरणम् । प्रसिद्धं दर्शपूर्णमासाभ्यां यजनम् । प्रसिद्धः पञ्चानां ¹महतां यज्ञानामनुप्रयोगः । उत्पन्नानामोषधीनां निर्वापणं दृष्टं भवति ॥ १५ ॥
अनु०— कृष्ण मृगचर्म आदि उपकरणों को जिस-जिस कार्य के प्रयोजन से रखा गया या उस-उस कार्य में प्रयुक्त करे । अग्नि की रक्षा का नियम सुज्ञात ही है, दर्श पूर्णमास नाम के यज्ञों के अनुष्ठान का नियम भी प्रसिद्ध है, पाँच महायज्ञों के प्रयोग का नियम भी ज्ञात है । उत्पन्न ओषधियों का निर्वापण भी देखा गया है।१५।
उत्पन्नानां तस्मिन् काले । अभिनवानामहन्यह्न्यार्जितानां वा ॥ १५ ॥
"विश्वेभ्यो देवेभ्यो जुष्टं निर्वपामी"ति वा तूष्णीं वा ताः संस्कृत्य साधयति ॥ १६ ॥
अनु०— "विश्वेभ्यो देवेभ्यो जुष्टं निर्वपामि" कहते हुए उन ओषधियों को पवित्र करे अथवा चुपचाप ही उनको शुद्ध कर पकाए ॥ १६ ॥
ओषधीनां संस्कारोऽवहननादिः । साधनं पाकः । एवंभूतमोदन²मग्नौ कृत्वा तच्छेषं स्वयं वाग्यतो भुञ्जीतेत्यभिप्रायः ॥ १६ ॥
तस्याऽध्यापनयाजनप्रतिग्रहा निवर्तन्ते ॥ १७ ॥
अनु०— उसके लिए अध्यापन, यज्ञ कराने और दान लेने का कर्म समाप्त हो जाता है ॥ १७ ॥
द्रव्यार्जनस्योपायान्तरविधानादध्यापनादीनां निवृत्तिरुक्ता ॥ १७ ॥
१. पञ्चमहायज्ञाः प्राग् विवृताः ॥
२. अन्नाऽग्नौ करणं नाम होमः ॥