बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 362, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३१० | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ वृत्त्युपायाः |
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**अनु०—**बिना जोती हुई छः निवर्तनं भूमि में खेती करे। भूमि के स्वामी को भाग देकर अपना अंश ग्रहण करे अथवा खेत के स्वामी की आज्ञा होने पर सम्पूर्ण अंश स्वयं ग्रहण करे। प्रातःकालीन भोजन की वेला से पहले ही ऐसे बैलों से जिनकी नाक में छेदकर रस्सी न पिन्हाई गयी हो और जिन्हें बधिया न किया गया हो, कोड़े या डण्डे का प्रयोग किये बिना, बार-बार पुचकारते-दुलारते हुए जुताई करे। इस विधि से छः निवर्तनं भूमि में कृषि कर्म करने वाला षण्णिवर्तनी कहलाता है॥ २॥
निवर्तनं नाम भूम्याः कर्षणं कृषीबलानां प्रसिद्धम्-इयदेकं निवर्तनमिति। निरुपहतं अकृष्टक्षेत्रं षट्संख्याविशिष्टानि निवर्तनान्यकृष्टक्षेत्राणि समापाद-यन्तीत्यर्थः। तत्र निष्पन्नौषधेरयं विशेषः—स्वामिने भागमित्यादि। भूस्वा-मिने भागोंऽशः परक्षेत्रविषयमेतत्। सामर्थ्यात् स चेदनुजानीयात्सर्वं स्वयमेव गृह्णीयात्। स्वक्षेत्रेषु नाऽयं विधिः स्वक्षेत्रत्वात्। आपदुपायोऽयम्। प्राक्प्रातरित्यादि व्याख्यातम्। एतेन विधानेन षण्णिवर्तनीशब्दं व्युत्पाद-यन्नुपसंहरति॥ २॥
कथं कौद्दालीत्याह—
कौद्दालीति जलाभ्याशे कुद्दालेन वा फालेन वा तीक्ष्णकाष्ठेन वा खनति बीजान्यावपति कन्दमूलफलशाकौषधीर्निष्पादयति। कुद्दा-लेन करोतीति कौद्दाली ॥ ३ ॥
**अनु०—**कौद्दाली वृत्ति का अनुसरण करने वाला किसी जलाशय के समीप कुदाल से, फाल से या नुकीले लकड़ी के टुकड़े से भूमि को खोदे और उसमें बीज बोकर कन्द, मूल, फल, शाक, ओषधि उत्पन्न करे। इस प्रकार कुद्दाल से भूमि खोद कर उससे उत्पन्न वस्तुओं से जीविका-निर्वाह करने वाला कौद्दाली होता है॥ ३॥
अभ्याशे समीपे अपरिग्रहे। कुद्दालमयौमुखं काष्ठम्। फालमायस्यं खनित्र-मिति यावत्। तीक्ष्णाग्रं काष्ठं प्रसिद्धम्। एतेषां सम्भवापेक्षो विकल्पः खनति विखनति। ततो बीजान्यावपति कन्दादीनाम्। कन्दमामोपयोग्यम्। मूलं पक्कोपयोग्यम्। अन्यत्प्रसिद्धम्॥ ३॥
तृतीया वृत्तिः ध्रुवा। तामाह—
ध्रुवायां वर्तमानश्शुकलेन वाससा शिरो वेष्टयति—"भूत्यै त्वा शिरो वेष्टयामी" ति ॥ ४ ॥
**अनु०—**ध्रुवा वृत्ति से जीविका निर्वाह करने वाला श्वेत वस्त्र से शिर को