भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 363

द्वितीयः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ३११

“भूत्यै त्वा शिरो वेष्टामि” । ( समृद्धि के लिए मैं तुम्हें अपने सिर पर बाँधता हूँ ) कहकर आच्छादित करे ॥ ४ ॥

प्रत्यारम्भं इति केचित् । अहरहरित्यन्ये । एवं कृष्णाजिनादानेष्वपि द्रष्टव्यम् ॥ ४ ॥

“ब्रह्मवर्चसमसि ब्रह्मवर्चसाय त्वे”ति कृष्णाजिनमादत्ते । अब्ब्लिङ्गाभिः पवित्रम् । “बलमसि बलाय त्वे”ति कमण्डलुम् ॥ ५ ॥

अनु०—"ब्रह्मवर्चसमसि ब्रह्मवर्चसाय त्वा” ( तुम ब्रह्म के तेज हो, ब्रह्म के तेज के लिए मैं तुम्हें धारण करता हूँ ) कहकर कृष्ण मृगचर्म ग्रहण करे । जल देवता के मन्त्रों से पवित्र को ग्रहण करे । 'बलमसि बलाय त्वा' ( तुम बल हो, तुम्हें बल के लिए ग्रहण करता हूँ ) कहकर कमण्डलु ग्रहण कर ॥ ५ ॥

आदत्त इत्यनुवर्तते ॥ ५ ॥

“धान्यमसि पुष्ट्यै त्वे”ति वीवधम् ॥ “सखा मा गोपाये”ति दण्डम् । अथोपनिष्क्रम्य व्याहृतीर्जपित्वा दिशामनुमन्त्रणं जपति—“पृथिवी चान्तरिक्षं च द्यौश्च नक्षत्राणि च या दिशः । अग्निवायुश्च सूर्यश्च पान्तु मां पथि देवता” इति । १मानस्तोकीयं जपित्वा ग्रामं प्रविश्य गृहद्वारे गृहद्वार आत्मानं वीवधेन सह दर्शनात् संदर्शनीत्याचक्षते ॥६॥

“धान्यमसि पुष्ट्यै त्वा” ( तुम अन्न हो, मैं तुम्हें पुष्टि के लिए ग्रहण करता हूँ ) कहकर वीवध को ग्रहण करे । "सखा मा गोपाय” ( तुम मित्र हो, मेरी रक्षा करो ) कहकर दण्ड ग्रहण करे । अपनी कुटी से निकलकर व्याहृतियों का जप करें और दिशामों के अनुमन्त्रण के लिए यह मन्त्र जपे—"पृथिवी चान्तरिक्षं च द्यौश्च नक्षत्राणि च या दिशः । अग्निवायुश्च सूर्यश्च पान्तु मां पथि देवता । ( पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक, नक्षत्र और दिशाएं, अग्नि, वायु और सूर्य देवता मार्ग में मेरी रक्षा करें ) । मानस्तोकीय ( तैत्तिरीय संहिता ३. ४. ११.२ के 'मा नस्तोके' आदि से आरम्भ होने वाला अंश ) का पाठ करते हुए गाँव में प्रवेश करे और प्रत्येक घर के द्वार पर वीवध के साथ उपस्थित होकर अपने को दिखाए, इसे ही संदर्शनी कहते हैं ॥ ६ ॥

ध्रुवा हि वृत्तिर्भिक्षाटनप्राधान्यात् । भैक्षभाजनं च वीवधः । तन्न तत्र प्रतिगृह्योपनिष्क्रम्य व्याहृतीर्जपति । दिशामनुमन्त्रणम्—'पृथिवी च' इति मन्त्रः । 'मा नस्तोके' इति गृहद्वारे । आत्मानं वीवधेन गृहद्वारिभ्यस्संदर्श-


१. मानस्तोकीयो व्याख्यास्यते ।