बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 368, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें३१६ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ वानप्रस्थभेदाः
**अनु०—**अग्नि पर भोजन पकाने वाले पचमानक, तथा भोजन न पकानेवाले अपचमानक ॥ २ ॥
अग्निपक्वाशिनः अनग्निपक्वाशिनश्चेति सूत्रार्थः ॥ २ ॥
अत्राऽप्याह—
तत्र पचमानकाः पञ्चविधाः—सर्वारण्यका वैतुषिकाः कन्दमूलभक्षाः फलभक्षाश्शाकभक्षाश्चेति ॥ ३ ॥
**अनु०—**इनमें भी पचमानक अर्थात् अग्नि पर अपना भोजन पकाने वाले वानप्रस्थ पाँच प्रकार के होते हैं (१) सर्वारण्यक अर्थात् वन की सभी प्रकार की खाद्य वस्तुओं का भक्षण करने वाले, (२) वैतुषिक जो बिना कूटे गये जंगली अन्न को खाकर जीवन निर्वाह करते हैं, (३) कन्द-मूल का भक्षण करने वाले (४) फलाहारी तथा (५) वन के शाक मात्र का भक्षण कर जीवन निर्वाह करने वाले ॥३॥
एते पचमानकप्रभेदाः ॥ ३ ॥
तत्र सर्वारण्यका नाम द्विविधाः द्विविधमारण्यमाश्रयन्तः—इन्द्रावसिक्ता रेतोवसिक्ताश्चेति ॥ ४ ॥
**अनु०—**इनमें भी वन'की सभी खाद्य वस्तुओं का आहार करने वाले सर्वारण्यक भी दो प्रकार के होते हैं और ये वन की दो प्रकार की वस्तुओं के भक्षण से वृत्ति चलाते हैं—इन्द्र द्वारा उत्पन्न वस्तुओं के भक्षण से (अर्थात् वर्षा से उत्पन्न वस्तुओं के भक्षण से) तथा वीर्य से उत्पन्न जीवों के भक्षण से (अर्थात् मृगादि पशुओं का मांस भक्षण कर) ॥ ४ ॥
अरण्ये भवमारण्यं तच्च द्विविधं—वल्ल्यादयो मृगादयश्च । तत्र वल्ल्यादिभक्षा इन्द्रावसिक्ताः , इन्द्रेण देवेन पर्जन्यरूपिणा वृष्ट्या सिक्ताः वर्धिताः वल्ल्यादयः । तद्भक्षणादिन्द्रावसिक्ताः । उक्तं चाऽऽचार्येण—'अथाऽस्य कर्मणस्सानुप्रदानं पितृवधो या च का च वलिप्रकृतिरिन्द्रकर्मैव तत्' इति । तथा रेतोऽवसिक्ताः मृगमांसाशिनः रेतसा हि हेतुभूतेनाऽवसिक्तानि मांसानि, तदाश्रयात् । सर्वारण्यकानां च द्वैविध्यम् ॥ ४ ॥
तदिदानीं प्रपञ्चयति--
तत्रेन्द्रावसिक्ता नाम वल्लीगुल्मलतावृक्षाणामानयित्वा श्रपयित्वा सायं प्रातरग्निहोत्रं हुत्वा यत्यतिथिव्रतिभ्यश्च दत्त्वाऽथेतरच्छेषभक्षाः ॥ ५ ॥