बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 370, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३१८ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ वानप्रस्थभेदाः |
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अथेतरान् त्रीन् समुच्चित्यऽऽह—
कन्दमूलफलशाकभक्षाणामप्येवमेव ॥ ८ ॥
अनु०— जो कन्द, मूल या शाक का भक्षण करते हैं वे भी इसी प्रकार करें॥८॥
एवमिति आनयित्वेत्यादीति शेषः॥ ८ ॥
इदानीमपचमानप्रकारभेदविधित्सयाऽऽह—
पञ्चैवाऽपचमानकाः—उन्मज्जकाः प्रवृत्ताशिनो मुखेनादायिनस्तोयाहारा वायुभक्षाश्चेति ॥ ९ ॥
अनु०— अपचमानक अर्थात् पकाकर न खाने वालों के भी पांच ही वर्ग हैं— उन्मज्जक, प्रवृत्ताशिन्, मुखेनादायिन्, तोयाहार और वायुभक्ष ॥ ९ ॥
एते भेदाः ॥ १ ॥
तेषां परस्परवैलक्षण्यं प्रतिपादयन्नाह—
तत्रोन्मज्जका नाम लोहाश्मकरणवर्जम् ॥
अनु०— इनमें उन्मज्जक वे हैं जो लोहे और पत्थर के उपकरणों का प्रयोग न करते हुए अपना भोजन तैयार करते हैं ॥ १० ॥
लोहकरणं दर्व्यादि। अश्मकरणमप्येवमाकृतिकमेव किञ्चित् । काष्ठान्येव करणमादाय इत्यर्थः ॥ १० ॥
हस्तेनाऽऽदाय प्रवृत्ताशिनः ॥ ११ ॥
अनु०— प्रवृत्ताशिन् हाथ में ही लेकर भक्षण करते हैं ॥ ११ ॥
भक्षयन्तीति वाक्यसमाप्तिः ॥ ११ ॥
मुखेनाऽऽदायिनो मुखेनाऽऽददते ॥ १२ ॥
अनु०— मुखेनादायिन् (पशुओं की तरह) मुख से ही लेकर भक्षण करते हैं ॥ १२ ॥
पशुवदित्यभिप्रायः ॥ १२ ॥
तोयाहाराः केवलं तोयाहाराः ॥ १३ ॥
अनु०— तोयाहार केवल जल पीकर ही रहते हैं ॥ १३ ॥
केवलशब्दादुपदंशादिस्थानेऽपि तोयस्यैव प्रवेशः कर्त्तव्यः ॥ १३ ॥