बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 371, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें[ तृतीयः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने तृतीयोऽध्यायः ३१९
वायुभक्षा निराहाराश्च ॥ १४ ॥ वैखानसानां विहिता दश दीक्षाः ॥ १५ ॥ यथाशास्त्रमभ्युपेत्यं दण्डं च मौनं चाऽप्रमादं च ॥ १६ ॥ वैखानसाश्शुद्ध्यन्ति निराहाराश्चेति ॥ १७ ॥
अनु०—वायुभक्ष किसी प्रकार का भोजन नहीं करते ॥ १४ ॥
अनु०—इस प्रकार वैखानसों के लिए दस प्रकार की दीक्षा होती है ॥ १५ ॥
अनु०—जो संन्यासी शास्त्रों के अनुसार नियमों का पालन कर रहा है वह दण्ड धारण करे, मौन रहे और प्रमाद (बिना सोचे-विचारे कोई कार्य) न करे ॥१६॥
अनु०--विखनस् के अनुसार नियमों का पालन करने वाले संन्यासी तथा आहार न करने वाले शुद्ध होते हैं अर्थात् उनके पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ १७ ॥
वायुभक्षा इत्येतावदेवोच्यमाने वाङमुखादायिवत् द्वयोः कारणताशङ्काऽपि स्यादिति मत्वा निराहाराश्चेत्युक्तम् । मुखेनादायिप्रभृतीनां त्रयाणां संज्ञासिद्धिमपि सन्देहनिवृत्त्यर्थं वृत्तिविवरणमाचार्येण कृतम् । वानप्रस्थसंन्यासभेदः किमर्थमाचार्यकृत इति । असावेव द्रष्टव्यः । यद्वा—उक्तव्यतिरिक्तवृत्तिनिषेधार्थम् ॥ १४-१७ ॥
एवं भेदेषूक्तेष्विदानी सर्वेषां संहत्याऽऽह—
शास्त्रपरिग्रहस्सर्वेषां ब्रह्मवैखानसानाम् ॥ १८ ॥
अनु०—सभी ब्राह्मण वैखानसों के लिए (या ब्रह्मवैखानसों के लिए) शास्त्र के अनुसार निम्नलिखित नियम होते हैं ॥ १८ ॥
वक्ष्यत इति शेषः । ब्रह्मणा दृष्टाः वैखानसाः ब्रह्मवैखानसाः । यद्वा—ब्राह्मणास्सन्त इति ॥ १८ ॥
तत्र प्रथमं तावत्—
न द्रुह्येद् दंशमशकान् हिमवान् तापसो भवेत् ।
वनप्रतिष्ठस्सन्तुष्टश्चीरचर्मजलप्रियः ॥ १९ ॥
अनु०—दंश और मच्छर जैसे क्षुद्र प्राणियों को भी हानि न पहुँचाये शीत सहन करने की क्षमता रखे । तपस्या में लगा रहे । वन में निवास करे । सन्तुष्ट रहे । वृक्षों की छाल तथा चर्म को ही वस्त्र के रूप में धारण करने में रुचि रखे॥१९॥
दंशादिकानामपि हिंसां नाऽऽचरेत् । द्रुहः जिघांसायां वर्तते । हिमवान् शीतसहिष्णुः । तद्ग्रहणं घर्मस्याऽप्युपलक्षणार्थम् । आह च—