बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३३० | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ यावकव्रतम् |
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शृतं च लघ्वश्नीयात् प्रयत: पात्रे निषिच्य ॥ १४ ॥
**अनु०—**जो के पक जाने पर उसके थोड़े से अंश को दूसरे पात्र में डालकर स्वयं शुद्ध होकर तथा आचमन कर खाये ॥ १४ ॥
नाऽत्र तिरोहितं किञ्चिदस्ति ॥ १४ ॥
“ये देवा मनोजाता मनोयुजस्सुदक्षा दक्षपितारस्ते नः पान्तु ते नोऽवन्तु तेभ्यो नमस्तेभ्यस्स्वाहे” त्यात्मनि जुहुयात् ॥ १५ ॥
अनु०—‘ये देवा मनोजाता मनोयुजस्सुदक्षा दक्षपितारस्ते नः पान्तु ते नोऽवन्तु तेभ्यो नमस्तेभ्यस्स्वाहा’ ( जो देवता मन से उत्पन्न हुए हैं, मन से संयुक्त हैं, अत्यन्त शक्ति शाली हैं, जिनके पिता दक्ष हैं, वे हमारी रक्षा करें, हमें बचावें, उनको नमस्कार है, उनको स्वाहा ) इस मन्त्र द्वारा उस पके हुए अन्न को आत्मा में ही आहुति करे ॥ १५ ॥
एते पञ्च पर्यायाः प्राणाहुतिमन्त्राः । तस्मान्मन्त्रो निवर्तते प्राशनसमये । कर्तुस्तु कालाभिधाननियमात् फलविशेषः ॥ १५ ॥
त्रिरात्रं ¹मेधार्थी ॥ १६ ॥
**अनु०—**मेधा की कामना करने वाला तीन रात्रियों इसी प्रकार यावक का प्राशन करे ॥ १६ ॥
पूर्वेण विस्तृतं प्रसृतयावकं प्राश्नीयादित्यनुवर्तते मेधानां ग्रहीतुं त्वस्य । तदशनम् ॥ १६ ॥
षड्रात्रं पीत्वा पापकृच्छुद्धो भवति ॥ १७ ॥
**अनु०—**छः रात्रियों में उपर्युक्त विधि से यावक पान करने पर पाप करने वाला शुद्ध हो जाता है ॥ १७ ॥
अल्पपापकृदिति शेषः ॥ १७ ॥
सप्तरात्रं पीत्वा भ्रूणहननं गुरुतल्पगमनं सुवर्णस्तैन्यं सुरापानमिति च पुनाति ॥ १८ ॥
**अनु०—**जो सात दिन-रात्रि यावक का पान करता है वह विद्वान् ब्राह्मण की हत्या, गुरुपत्नीगमन, सुवर्ण की चोरी और सुरापान के पाप से भी मुक्त हो जाता है ॥ १८ ॥
१. मेधावी इति, क.