बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३४२ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ चान्द्रायणकल्पः |
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**अनु०—**एक बार किसी प्रयोजन से लाये गये लौकिक अग्नि को ही सदा स्थापित रखे अथवा दो अरणियों का मन्थन कर अग्नि उत्पन्न करे ॥ ५ ॥
**टि०—**जब तक चान्द्रायण व्रत करे तब तक अग्नि को बनाये रखे। इसी अग्नि में चान्द्रायण व्रत की समाप्ति पर होम किया जाता है।
लौकिक एवाऽग्निः कर्मान्तरार्थं प्रणीतो यथा न नश्येत् तथा धार्य इत्येवमर्थं सकृद्ग्रहणम्। यावच्चान्द्रायणं नित्यं धारणमित्यर्थः। तदसम्भवेऽरण्योस्समारोपणम्। चान्द्रायणापवर्गे करिष्यमाणाय होमाय मन्थनं च। यस्य पुनररणी न स्तस्तस्याऽपि यस्मात्कस्माच्चित् काष्ठद्वयात् निर्मन्थ्योऽग्निः ॥ ५ ॥
ब्रह्मचारी सुहृत्प्रैषायोपकल्पी स्यात् ॥ ६ ॥
**अनु०—**शुद्ध हृदय वाला ब्रह्मचारी उसकी सहायता के लिए तथा उसके आदेश का पालन करने के लिए उसके समीप रहे ॥ ६ ॥
ब्रह्मचारी अनृतौ। सुहृत् शोभनं हृदयं यस्य स तथोक्तः। असहायेन न हि शक्यते एतावन्महत्कर्म कर्तुमित्यात्मनः प्रैषकरणायोऽन्यमुपकल्पयते इत्युपकल्पी। उक्तं च—
'अपि यत्सुकरं कर्म तदप्येकेन दुष्करम्। विशेषतोऽसहायेन' इति। योऽसावन्यः प्रेषितार्थकरणायोपकल्पितः असावृृत्विग्धर्मेति केचिदाहुः। अन्ये लौकिकार्थधर्माऽसग्विति। तत्पुनर्युक्तायुक्ततया विचारणीयम् ॥ ६ ॥
हविष्यं च व्रतोपायनम् ॥ ७ ॥
**अनु०—**व्रत के आचरण की अवधि में यज्ञ की हवि ही व्रत करने वाले का मुख्य भक्ष्य होता है ॥ ७ ॥
हविष्यमक्षारलवणं व्रतोपायनं प्रधानद्रव्यम्। यथाऽन्नादिद्रव्यम्, नोपदंशादि ॥ ७ ॥
अग्निमुपसमाधाय सम्परिस्तीर्याऽऽग्निमुखात्कृत्वा पक्काज्जुहोति ॥८॥
**अनु०—**अग्नि पर समिध् रखकर उसे प्रज्वलित कर, उसके चारो ओर कुश फैलाकर अग्निमुख तक की क्रियाएं कर, पकाए गए अन्न में से लेकर हवन करे ।८।
अवदानधर्मेणाऽदायेति शेषः ॥ ८ ॥
अग्नये या तिथिस्यान्नक्षत्राय सदैवताय"अत्राह गोरमन्वते'"ति
१. अत्राह गोरमन्वत नाम त्वंष्टुरपीच्यम् । इत्या चन्द्रमसो गृहे ॥