भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 409, कुल 486 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 409

नवमः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने नवमोऽध्यायः ३५५

भैक्षमिति क्रियाविशेषणम् । प्रयुञ्जानः पारायणमिति शेषः । दिव्यं चक्षुर्दूरदर्शनम् ॥ १६ ॥

षण्मासान्यावकभक्षश्चतुरो मासानुदकसक्तुभक्षो द्वौ मासौ फलभक्षो मासमब्भक्षो द्वादशरात्रं वाऽप्राश्नन् क्षिप्रमन्तर्धीयते ज्ञातीन्पुनाति सप्ताऽवरान्सप्त पूर्वान्नात्मानं पञ्चदशं पंक्तिं च पुनाति ॥ १७ ॥

अनु०—यदि छः मास तक यावक का भक्षण करे, चार मास जल और सक्तु का भक्षण करे, दो मास फल भक्षण करे, एक मास केवल जल पीकर रहे, अथवा बारह दिन का उपवास करे तो शीघ्र लुप्त होने की शक्ति प्राप्त कर लेगा, बन्धु-बान्धवों को, अपने से पहले की सात पीढ़ी को, बाद की सात पीढ़ी को और पन्द्रहवें अपने को पवित्र करता है । और ब्राह्मणों की जिस पंक्ति में प्रवेश करता है उसे पवित्र करता है ॥ १७ ॥

प्राश्नन्नित्यत्राऽकारप्रश्लेषः कर्त्तव्यः अप्राश्नन्निति । पराचीनं वा पारायणं प्रयुञ्ज्येत्यर्थः ॥ १७ ॥

तामेतां देवनिश्श्रयणीत्याचक्षते ॥ १८ ॥

अनु०—इसको देवों तक पहुंचने के लिए नसेनी ( सीढ़ी ) कहा गया है ॥१८॥

निश्श्रयणी निश्श्रेयसहेतुः । निश्श्रेयसस्य संश्रयः सोपानमिति यावत् ॥ १८ ॥

निश्श्रेयसहेतुत्वं दर्शयति—

एतया वै देवा देवत्वमगच्छन्नृषय ऋषित्वम् ॥ १९ ॥

अनु०—इसीसे देवों ने देवत्व प्राप्त किया और ऋषियों ने ऋषि के पद प्राप्त किये ॥ १९ ॥

अथेदानीमनशनपारायणारम्भकालत्वेनाऽहारावयवानाह—

तस्य ह वा एतस्य यज्ञस्य त्रिविध एवाऽऽरम्भकालः—प्रातस्सवने माध्यन्दिने सवने, ब्राह्मे वाऽपररात्रे ॥ २० ॥

अनु०—इस यज्ञ को आरम्भ करने के तीन काल हैं, प्रातः सवन का काल, माध्यंदिन सवन का काल तथा रात्रि का अन्तिम अंश जिसे ब्राह्म मुहूर्त कहते हैं ।२०।

अतश्च होमा एतेष्वेव कालेषु कर्त्तव्याः ॥ २० ॥

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद) · पृष्ठ 409, कुल 486 में से · BharatKosha