भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 424, कुल 486 में से

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पृष्ठ 424

३७० बौधायन-धर्मसूत्रम् [प्रणवव्याहृतीनां प्रशंसा

स एव धर्मस्य लक्षणं हेतुः धर्मोऽपूर्वम्। योगमूलाः योगकारणकाः गुणरूपादयः ॥ २६ ॥

अथ प्राणायामावयवभूतानां प्रणवव्याहृतीनां प्रशंसा— प्रणवाद्यास्तथा वेदाः प्रणवे पर्यवस्थिताः।
प्रणवो व्याहृतयश्चैव नित्यं ब्रह्म सनातनम् ॥
प्रणवे नित्ययुक्तस्य व्याहृतीषु च सप्तसु।
त्रिपदायां च गायत्र्यां न भयं विद्यते क्वचित् ॥ २७ ॥

**अनु०—**वेद प्रणव से ही आरम्भ होते हैं। उनका अन्त भी प्रणव अर्थात् 'ओम्' से होता है। प्रणव और व्याहृतियाँ नित्य और सनातन ब्रह्म हैं। जो व्यक्ति नित्य ही ओंकार, सात व्याहृतियों तथा त्रिपदा गायत्री के उच्चारण में लगा हुआ है, उसके लिए कोई भी भय नहीं रह जाता ॥ २७ ॥

पर्यवस्थिताः परिसमाप्ताः व्याहृतयस्सप्त ॥ २७ ॥

एवमवयशः प्राणायामांस्तुत्वा तस्य सङ्क्षेपतो लक्षणं करोति — सव्याहृतिकां सप्रणवां गायत्रीं शिरसा सह ।
त्रिः पठेदायतप्राणः प्राणायामस्स उच्यते ॥ २८ ॥

**अनु०—**यदि प्राणवायु को रोककर व्याहृतियों, ओंकार तथा शिरस् के साथ गायत्री मन्त्र का तीन बार जप करे तो एक प्राणायाम होता है ॥ २८ ॥

अनिर्दिष्टविषये प्राणायामोऽपि प्रायश्चित्तमुच्यत इत्याह— सव्याहृतिकासप्रणवाः प्राणायामास्तु षोडश ।
अपि भ्रूणहनं मासात्पुनन्त्यहरहः कृताः ॥ २६ ॥

**अनु०—**प्रतिदिन व्याहृतियों और ओंकार के साथ सोलह बार प्राणायाम करने पर एक मास में विद्वान् ब्राह्मण की हत्या का पाप करने वाला भी पवित्र हो जाता है ॥ २९ ॥

अपिशब्दात्किं पुनरन्यानीति गम्यते ।

एतदाद्यं तपश्श्रेष्ठमेतद्धर्मस्य लक्षणम् । सर्वदोषोपघातार्थमेतदेव विशिष्यते एतदेव विशिष्यत इति ॥ ३० ॥

इति चतुर्थे प्रथमः खण्डः ॥

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