भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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द्वितीयः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ३७१

अनु०—यही सबसे उत्तम तप है, यही धर्म का श्रेष्ठ लक्षण है। सभी पापों को नष्ट करने के लिए यह प्राणायाम ही सबसे विशिष्ट रूप से पवित्र करने वाला है ॥ ३० ॥

दोषाः पापानि ॥ २८-३० ॥

इति गोविन्दस्वामिकृते बौधायनीयधर्मविवरणे चतुर्थप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ॥


चतुर्थप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः

द्वितीयः खण्डः

प्रायश्चित्तानि वक्ष्यामो नानार्थानि पृथक्पृथक् ।
तेषु तेषु च दोषेषु गरीयांसि लघूनि च ॥ १ ॥
अनु०— हम विभिन्न दोषों के प्रायश्चित्तों का, दोषों के अनुसार बड़े और हल्के प्रायश्चित्तों का पृथक्-पृथक् विवेचन करेंगे ॥ १ ॥

यद्यत्र हि भवेद्युक्तं तद्धि तत्रैव निर्दिशेत् ।
भूयो भूयो गरीयस्तु लघुष्वल्पीयसस्तथा ॥ २ ॥
अनु०— दोष के अनुसार जो प्रायश्चित उचित हो उसी का निर्देश करना चाहिए। बड़े दोष के लिए बड़े प्रायश्चित्त और लघु दोषों के लिए लघु-प्रायश्चित्त करने चाहिए ॥ २ ॥

विधिना शास्त्रदृष्टेन प्रायश्चित्तानि निर्दिशेत् ।
प्रतिग्रहीष्यमाणस्तु प्रतिगृह्य तथैव च ॥ ३ ॥
अनु०— शास्त्र में बतायी गयी विधि के अनुसार प्रायश्चित्त करे ॥ ३ ॥

ऋचस्तरत्समन्द्यस्तु चतस्रः परिवर्तयेत् ॥ ४ ॥
अनु०— जिसको दान लेना हो या जिसने दान लिया हो वह तरत्समन्द्य नाम के ऋङ्मन्त्रों का बार-बार जप करे ॥ ४ ॥

'अभोज्यानां तु सर्वेषामभोज्यान्नस्य भोजने ।


१. अभोज्यानां तु सर्वेषां मार्जनं पावनं स्मृतम् ॥ इत्येवं सूत्रपाठो व्याख्यान-पुस्तकेषु, व्याख्याऽप्येतत्पाठानुकूलैव ॥