बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
DevanagariHindipublished486 पृष्ठ
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४१८ | बौधायन-धर्मसूत्रम्
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ब्राह्मणस्पत्यं तूपरमालभेत | तै. सं. २. १. ५. | १०२ |
| ब्राह्मणस्याधिकाः प्रवचन- | गौ. ध. १०. २. | ३ |
| भिक्षादानमप्सुपूर्वम् | गौ. ध. ५. १९. | २७५ |
| भिद्यते हृदयग्रन्थिः | मुण्ड. २. २. ८. | २५६ |
| भूतानां प्राणिनःश्रेष्ठाः | मनु. १. ९६. | २७० |
| भूतेभ्यो नमः | याज्ञिकी. ६७. | २४६ |
| भूमियमयज्ञियैस्तृणैः | वै. ध. १२. १०. | ६७ |
| भूरग्नये च पृथिव्यै च | याज्ञिकी ५. | २६१ |
| भृत्यानानुपरोधेन | मनु. ११. १०. | २१० |
| भूर्वृक्षिशिलावर्जम् | व. ध. २४. ६ | ३८३ |
| मद्यं नित्यं ब्राह्मणः | गौ. ध. २. २६. | १९ |
| मद्यभाण्डस्थिता आपः | व. ध. २०. २४. | १६० |
| मधुवाता ऋतायते | ऋ. सं. १. ३. १८. | २६९ |
| मनुष्यलोकः पुत्रेण | श. ब्रा. १४. ४. ३. २४. | २५३ |
| मशकैर्मक्षिकामिश्च | व. ध. ३. ४५. | २६३ |
| महाहविर्होता | तै. आ. ३. ५. | ३४० |
| मातरि पितर्याचार्ये | आप. ध. १. १०. ४ | १४८ |
| माता मातृष्वसा | नार. १२. ७३. | १६९ |
| मानस्तोके तनये | तै. सं. ४. ५. १०. | ३११ |
| मासि श्राद्धे च तामेव | शङ्खः | १४८ |
| मार्जारनकुलौ हत्वा | मनु. ११. १३१. | १३५ |
| मूर्धानं दिवः | ऋ. सं. ४. ५. ९. | २७० |
| मृतेऽपि वा सा पुनर्भूः | व. ध. १७. २१ | १९१ |
| य इन्द्रियकामो वीर्यकामः | तै. सं. २. ३. ७. | १५ |
| य उभयादत् | तै. सं. २. २. ६. | ११ |
| यः करोति तु | मनु. १२. १२. | ४६ |
| यः प्रमत्तां हन्ति | आप. ध. १. २९. २. | ३६१ |
| यं यजमानो | बौ. श्रौ. ६. २८. | ११५ |
| यं यं क्रतुमधीते | तै. आ. २. १५. | २४८ |
| यच्चाउतस्त्रिय आहुः | बौ. पितृ. १. ५. १५. | ८७ |
| यच्चिद्धि ते | तै. सं. ३. ४. ११. | २२५ |
| यत्र यत्र कामयते | बौ. गृ. २. १२. | ३५ |
| यथाकर्मर्त्विजः | १२० | |
| यथा वृक्षस्य सम्पुष्पितस्य | तै. आ. १०. ११. | ४०७ |
| (१) यथासम्भवमुत्स्वेदनं | शङ्खः | ५७ |
१. मुद्रितशंखस्मृतावित्थं नोपलभ्यते ।