भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 486 में से

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प्रथमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ७

व्यवहारं प्रायश्चित्तादिकं वा यद्वदन्ति तमसा अन्धकारेणाऽऽविष्टा अजा- नतः अजानन्तः यस्मिन् पापकर्मणि एभिः प्रायश्चित्तं विहितमिति शेषः ॥१२॥

‘एको वा स्यादनिन्दितः’ ( १.१.९ ) इति यदुक्तं, तत्राऽऽह—

बहुद्वारस्य धर्मस्य सूक्ष्मा दुरनुगा गतिः ।
तस्मान्न वाच्यो ह्येकेन बहुज्ञेनाऽपि संशये ॥ १३ ॥

अनु०— ( श्रुति, स्मृति, सदाचार आदि प्रमाणों पर आश्रित ) धर्म के अनेक द्वार हैं । उसका मार्ग अत्यन्त सूक्ष्म और कठिन है । इसलिए संशय होने पर एक व्यक्ति को अकेले निर्णय नहीं देना चाहिए, भले ही वह अनेक विद्याओं का ज्ञाता क्यों न हो ॥ १३ ॥

अनेकश्श्रुतिस्मृतिसदाचारप्रमाणकत्वाद्धर्मस्य बहुद्वारत्वम् । अत एव चाऽस्य सूक्ष्मत्वं दुरनुगत्वं च । तथा हि—

शाखानां विप्रकीर्णत्वात् पुरुषाणां प्रमादतः ।
नानाप्रकरणस्थत्वात् सूक्ष्मा दुरनुगा गतिः ॥

तस्मात् इत्युपसंहारः ॥ १३ ॥

बहवः पुनः—

धर्मशास्त्ररथारूढा वेदखड्गधरा द्विजाः ।
क्रीडार्थमपि¹ यद् ब्रूयुस्स धर्मः परमःस्मृतः ॥ १४ ॥

अनु०-- धर्मशास्त्र-रूपी रथ पर चलने वाले, वेद-रूपी खड्ग को धारण करने वाले द्विज खेल में ही जो कुछ कह दे वह परम धर्म माना जाता है ॥ १४ ॥

शिष्टानां प्राबल्यं प्रदर्शयितुं धर्मशास्त्राणि वेदांश्च रथायुधैरुपमीयन्ते ॥१४॥

शिष्टैर्हि वर्णाश्रमादयो व्यवस्थापिताः । तेषु पापं न लिप्यत इत्याह—

यथाऽश्मनि स्थितं तोयं मारुतोऽर्कः प्रणाशयेत् ।
तद्वत्कर्त्तरि यत्पापं जलवत् संप्रलीयते ॥ १५ ॥

अनु०-- जिस प्रकार पत्थर के ऊपर एकत्र जल को वायु और सूर्य सुखा कर नष्ट कर देते हैं उसी प्रकार ( शिष्ट वचन के अनुसार ) करने वाले का जो भी पाप होता है, वह जल के समान नष्ट हो जाता है ॥ १५ ॥


१. अपिशब्दात् किमुत्यं प्रतीयते । यदि विचार्य ब्रूयुः, तर्हि किं वक्तव्यमिति ।

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