बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 65, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः १३
'गङ्गायमुनयोरन्तरमित्येके ॥ ११ ॥
अनु०—कुछ आचार्यों के अनुसार गंगा और यमुना नदियों के बीच का भूप्रदेश आर्यावर्त है ॥ ११ ॥
आर्यावर्तत्वे विकल्पः ॥ ११ ॥
अथाऽप्यत्र भाल्लविनो गाथामुदाहरन्ति ॥ १२ ॥
अनु०—इस सम्बन्ध में भाल्लविन् शाखा के अनुयायी एक गाथा भी उद्धृत करते हैं ॥ १२ ॥
टि०—गोविन्द स्वामी की टीका में भाल्लवियों को सामवेद की एक शाखा का बताया गया है ।
आर्यावर्तान्तरप्रदर्शनार्थं भाल्लविनः छन्दोगविशेषाः । गाथा श्लोकः ॥१२॥
तमाह— पश्चात् सिन्धुर्विसरणी सूर्यस्योदयनं पुरः । यावत्² कृष्णो विधावति तावद्धि ब्रह्मवर्चसमिति ॥ १३ ॥
अनु०—पश्चिम में लुप्त होनेवाली नदी पूर्व में सूर्य के उदय का स्थान —इनके बीच जहाँ तक कृष्णमृग पाया जाता है, वहाँ तक ( अध्ययन, ज्ञान, अनुष्ठान से उत्पन्न ) ब्रह्मतेज भी पाया जाता है ॥ १३ ॥
टि०—'सिन्धुः विसरणी' का सामान्यतः लुप्त होनेवाली नदी अर्थ किया गया है, किन्तु 'विकरणी' या 'विकरण' पाठ भी मिलता है जिसका अर्थ विभाजन करनेवाली नदी है । 'सिन्धु-विसरणी' से सरस्वती का अर्थ लेना अधिक संगत प्रतीत होता है ।
कृष्णः कृष्णमृगः । ब्रह्मवर्चसं अध्ययनज्ञानानुष्ठानाभिजनसम्पत् । म्लेच्छ-देशस्त्वतः परम् ॥ १३ ॥
तदाह- अवन्तयोऽङ्गमगधाः सुराष्ट्रा दक्षिणापथाः । उपावृत्सिन्धुसौवीरा एते संकीर्णयोनयः ॥ १४ ॥
१. अस्य च मूलम्—तैत्तिरीयारण्यके द्वितीयप्रपाठकान्तिमानुवाकस्यं "नमो गङ्गायमुनयोर्मुनिभ्यश्च नमः" इति वाक्यमिति विभावयामः ॥
२. कृष्णा विधावन्तीति क. पु. अत्र वासिष्ठान्यपि सूत्राणि प्रायश इमान्येवा-ऽनुकुर्वन्ति ।