भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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१४ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ अगम्यदेशाः

**अनु०—**अवन्ति, अङ्ग, मगध, सुराष्ट्र, दक्षिणापथ, उपावृत्, सिन्धु देशों के निवासी तथा सौवीर संकीर्णयोनि (मिश्रित उत्पत्तिवाले) होते हैं ॥ १४ ॥

**टि०—**इस गाथा का भाव यह है कि इन देशों में जो नियम या आचार प्रचलित है वे प्रामाणिक नहीं हैं, क्योंकि इन देशों के निवासियों की उत्पत्ति शुद्ध नहीं है।

^१स्त्रीषु व्यवस्था नाऽस्तीति यावत् । अवन्त्यादिषु कल्याणचारो नाऽस्ति ॥ १४ ॥

किञ्च–केचिद्देशाः प्रवेशार्हा अपि न भवन्ति । तत्प्रवेशे प्रायश्चित्तविधा-नात् । तत्र दूरोत्सारितमाचारग्रहणमित्याह—

आरट्टान् कारस्करान् पुण्ड्रान् सौवीरान् वंगान् कलिङ्गान् प्रानूनानिति च गत्वा पुनस्तोमेन यजेत सर्वपृष्ठया वा ॥ १५ ॥

**अनु०—**आरट्ट, कारस्कर, पुण्ड्र, सौवीर, वंग, कलिग, प्रानून—इनमें से किसी प्रदेश की यात्रा करने पर (प्रायश्चित्तस्वरूप) पुनस्तोम या सर्वपृष्ठा इष्टि करनी चाहिए ॥ १५ ॥

**टि०—**इस सूत्र के अनुसार उपर्युक्त प्रदेशों में प्रवेश करना पापजनक या दोष का कारण होता है और उसके लिए प्रायश्चित्त करना होता है । अवन्ती प्रयाग से पश्चिमोत्तर प्रदेश, अंग पूर्वी बंगाल, मगध बिहार, सौराष्ट्र दक्षिणी काठियावाड़ का प्रदेश है । सौवीर सम्भवतः पश्चिमी-दक्षिणी पंजाब के निवासी थे ।

आरट्टों का निवासस्थान पंजाब था, कारस्कर सम्भवतः दक्षिण भारतीय थे । कलिग कृष्णा नदी के मुहाने और उड़ीसा के बीच का प्रदेश है । उल्लेख ऐतरेय ब्राह्मण ७।१८ में तथा महाभारत में भी है । इस विषय में ब्यूह्लैर के अंग्रेजी अनुवाद की टिप्पणी द्रष्टव्य है ।

^२पुनस्तोमो नाम एकाहः । इष्टप्रथमसोमस्यैव प्रायश्चित्तमेकाहकाण्डोक्तं द्रष्टव्यम् । 'यदि पद्धयामेव विशेषं कुर्वीतैष ह वै पद्धयां पापं करोत्यारट्टान् कारस्करान् पुण्ड्रान् सौवीरान् वा गच्छति' इति । ^३सर्वपृष्ठेष्टिस्त्वाहिताग्नि-


१. स्त्रीपुंसयोरिति, ग. पु.
२. अथैष पुनस्तोमः “यो बहु प्रतिगृह्य गरगीरिव मन्येत स एतेन यजेत” ( तां. ब्रा. १९.४. १) ( का. श्रौ. २२.१०.१६) इत्यनेन यो विहितस्सोमयाग एकाहा-त्मकः सः । एकसुत्याकस्सोमयाग एकाह इत्युच्यते ।
३. बृहत्, रथन्तर वैरूप, नैराज, शाक्वर, रैवताख्यानि, षट् सामानि पृष्ठाख्य-स्तोत्रसाधनभूतानि । तत्प्रतिपाद्यगुणविशिष्ट इन्द्रो देवताऽस्या इष्टेरिति कृत्वा इष्टि-रियं सर्वपृष्ठेष्टिरिति कथ्यते ।