भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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तृतीयः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः २३

गुरोर्वाक्यप्रतिघातः तदर्थाकरणं विलम्बनं वा । सोऽत्र दृष्टादृष्टार्थेषु कर्मसु । यद्वा—विद्याग्रहणात् प्रभृत्यूर्ध्वं च । अन्यत्र पातकात् पतनीयात् यस्मिन् गुरूक्तकर्मणि कृते ब्रह्महत्यादिना पतितो भवति तद्वर्जयेदित्यभिप्रायः ।

'यावदर्थसम्भाषी स्त्रीभिः ॥ २४ ॥

**अनु०—**स्त्रियों के साथ उतनी ही बात करे जितना प्रयोजन हो ॥ २४ ॥

बहुभाषणादतिप्रसङ्गसम्भवेदिति ॥ २४ ॥

नृत्तगीतवादित्रगन्धमाल्योपानच्छत्रधारणाञ्जनाभ्यञ्जनवर्जी ॥२५॥

**अनु०—**नृत्य, गीत, वादन, सुगन्धित द्रव्य का प्रयोग, मालाधारण, जूते और छाते का प्रयोग, आँखों में अंजन का प्रयोग, ( सिर पर या शरीर पर ) अभ्यञ्जन का प्रयोग—इन सबका वर्जन करे ॥ २५ ॥

वादित्रं पटहादि, गन्धश्चन्दनादि, माल्यं पुष्पादि, गन्धादिषु च त्रिषु धारणशब्दः प्रत्येकमभिसम्बध्यते—गन्धधारणमित्यादि । उपानद्ग्रहणं पादुकाया अप्युपलक्षणार्थम् । अञ्जनमक्ष्णोः । अभ्यञ्जनं शिरसि ।

दक्षिणं दक्षिणेन सव्यं सव्येन चोपसंगृह्णीयाद्दीर्घमायुः स्वर्गं चेच्छन् ॥ २६ ॥

**अनु०—**यदि दीर्घ आयु और स्वर्ग की इच्छा हो तो ( गुरु के ) दाहिने पैर को दाहिने हाथ से तथा बायें पैर को बाँये हाथ से स्पर्श करता हुआ प्रणाम करे ॥२६॥

**टिप्पणी—**आपस्तम्ब धर्म० १.२.५. २१ तथा विष्णु० २७.१५ में गुरु के चरण स्पर्श का नियम विशेष रूप से द्रष्टव्य है । कुछ पुस्तकों में इस सूत्र को दो भागों में विभक्त कर दिया गया है। आपस्तम्ब १.२.४.१५ में भी इसी प्रकार का अदृष्ट फल संयुक्त है।

दक्षिणं पादं दक्षिणेन पाणिना स्पृशेत् । इतरं चेतरेण । तदभिमुख एव ।

आह च—

व्यत्यस्तपाणिना कार्यमुपसंग्रहणं गुरोः ॥ इति ॥

दीर्घमायुर्ध्यायन स्वर्गं च ॥ २६ ॥

'असावहं भो' इति श्रोत्रे संस्पृश्य मनस्समाधानार्थम् ॥ २७ ॥

**अनु०—**प्रणाम के समय अपने चित्त को एकाग्र करने के लिए कानों का स्पर्श करते हुए तथा 'असो अहं' ( अपना नाम लेकर ) भोः' कहना चाहिए ॥ २७ ॥


१. Cf आपस्तम्बधर्म १. ३. १६.