बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 74, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें| २२ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ ब्रह्मचारिधर्माः |
|---|
ते ब्राह्मणाद्यास्स्वकर्मस्थाः ॥ १९ ॥
अनु०— भिक्षाचरण ब्राह्मण आदि से ही करे जो अपने वर्णानुसार कर्म का आचरण करने वाले हों ॥ १९ ॥
स्वकर्मसु प्रसिद्धाः । तथा चाऽऽह गौतमः—'सार्ववर्णिकं भैक्षाचरणमभिशस्तपतितवर्जम्' ति । ननु 'द्विजातिषु स्वकर्मस्थेषु' इति सूत्रयितव्ये किमिति सूत्रद्वयारम्भः ? सत्यम्, अयं ह्याचार्यो नातीव ग्रन्थलाघवप्रियो भवति । अथवा आरम्भसामर्थ्यादेव प्रशस्ताभावे सत्यप्रशस्तद्विजातिष्वपि न दोष इति गम्यते ।
आह च मनुः—
वेद्यज्ञैरहीनानां प्रशस्तानां स्वकर्मसु ।
ब्रह्मचार्याहरेद् भैक्षं गृहेभ्यः प्रयतोऽन्वहम् ॥
सर्वं हि विचरेद् ग्रामं पूर्वोक्तानामसम्भवे ।
गौतमीयेऽपि सर्ववर्णग्रहणमप्रशस्तपरिग्रहार्थमेव ॥ १९ ॥
उक्तं भिक्षाचरणं ब्रह्मचर्ये । अथ समिदाधानमाह—
सदाऽरण्यात्समिध आहृत्याऽऽदध्यात् ॥ २० ॥
अनु०— प्रतिदिन वन से समिध् लाकर उनका अग्नि के ऊपर आधान करे ॥ २० ॥
अग्नाविति शेषः । अरण्यग्रहणं ससमित्कदेशप्रदर्शनार्थम् ॥ २० ॥
सत्यवादी ह्रीमाननहङ्कारः ॥ २१ ॥
अनु०— ब्रह्मचारी सत्यभाषी, लज्जाशील तथा अहङ्कार हीन होवे ॥ २१ ॥
स्यादिति शेषः ॥ २१ ॥
१पूर्वोत्थायी जघन्यसंवेशी ॥ २२ ॥
अनु०— ( गुरु से ) पहले सोकर उठे और रात्रि में गुरु के सोने के बाद शयन करे ॥ २२ ॥
गुरोरस्यादिति शेषः ॥ २२ ॥
सर्वत्राऽप्रतिहतगुरुवाक्योऽन्यत्र पातकात् ॥ २३ ॥
अनु०— उन कर्मों के आदेशों को छोड़कर, जिनके करने से पतित होने का विधान है, गुरु के सभी आदेशों का तत्काल पालन करना चाहिए ॥ २३ ॥
१. Cf आपस्तम्बधर्म १