भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 486 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 88
३६बौधायन-धर्मसूत्रम्[ उपनयनकालः

उष्णीषमजिनमुत्तरीयमुपानहौ छत्रं चौपासनं दर्शपूर्णमासौ च ॥६॥

**अनु०—**उष्णीष (पगड़ी) अजिन का उत्तरीय, जूता और छत्र धारण करे अग्नि का आधान करे, दर्श और पूर्णमास का स्थालीपाक करे ॥ ६ ॥

एतेऽप्यस्य भवेयुरिति शेषः। उष्णीषं शिरोवेष्टनं, अजिनमुत्तराय उभयमपि भवेदित्यर्थः। औपासनं एकाग्निपरिचरणं, तदेवौपासनशब्देनाऽऽह—दर्शपूर्णमासौ च स्थालीपाकविधानेन कर्तव्यौ ॥ ६ ॥

पर्वसु च केशश्मश्रुलोमनखवापनम् ॥ ७ ॥

**अनु०—**पर्वों पर केश, दाढ़ी-मूँछ, लोम को बनवावे तथा नखोंको कटवाये॥७॥

कर्तव्यमिति शेषः। केशा मूर्धजाः। श्मश्रुमुखजम्। लोमगुह्यप्रदेशजम्। नखाः करजादयः ॥ ७ ॥

तस्य वृत्तिः ॥ ८ ॥

**अनु०--**अब उस स्नातक की जीवन-वृत्ति का विधान किया जाता है ॥ ८ ॥
**टि०—**गोविन्द के अनुसार 'तस्य' से गृहस्थ का भी अर्थ गृहीत होता है।

तस्य स्नातकस्य वृत्तिः यात्रा जीवनोपायो वक्ष्यते। प्रकृतेऽपि स्नातके तस्य ग्रहणं वृत्तिव्यतिरिक्तधर्माणां गृहस्थस्याऽपि प्रवेशार्थम् ॥ ८ ॥

ब्राह्मणराजन्यवैश्यरथकारेष्वामं लिप्सेत ॥ ९ ॥

**अनु०--**ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और रथकारसे बिना पका हुआ अन्न माँगे ॥९॥

आमग्रहणात् पक्वप्रतिषेधः। आमाभावे पक्वयाचनं चाऽनुज्ञायते। तथा च वसिष्ठः 'क्षुधा परीतस्तु किञ्चिदेव याचेत' इति प्रक्रम्य 'धान्यमन्नं वा न तु स्नातकः क्षुधाऽवसीदेदित्युपदेशः' इति। क्षुन्निवृत्तिसमर्थस्य द्रव्यस्यैव विधिः ॥ ९ ॥

तदभावे—

भैक्षं वा ॥ १० ॥

**अनु०--**अथवा अनेक व्यक्तियों से भिक्षा मांगकर जीवन-निर्वाह करे ॥ १० ॥
**टि०—**गोविन्दस्वामी के अनुसार इस सूत्र का यह भाव है कि विपत्ति में अनेक लोगों से भी भिक्षा माँग सकता है।

भिक्षाणां समूहो भैक्षं, आपदि बहुभ्यो याचेतेत्यर्थः ॥ १० ॥

याच्ञावस्थायाम्—

वाग्यतस्तिष्ठेत् ॥ ११ ॥