भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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४४ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ कमण्डलुचर्या

अनु०--मूत्र और मलत्याग करते समय कमण्डलु को दाहिने हाथ में रखे और आचमन करते समय बायें हाथ में ॥ ३ ॥

मूत्रपुरीषयोराचमने च नियमः। अनुपयोगकाले यथासौकर्यं भवति तथा गृह्णीयादित्यर्थः ॥ ३ ॥

एतत्सिद्ध्यति साधूनाम् ॥ ४ ॥

अनु०--ये ( कमण्डलु-विषयक ) नियम साधुओं ( विद्वानों ) के विषय में लागू होते हैं ॥ ४ ॥

एतस्मिन् कमण्डलौ ये धर्मा अभिहितास्ते साधूनां सिद्ध्यन्ति नेतरेषाम्। साधवश्च निर्विशङ्कितशाखार्थाः ॥ ४ ॥

अमुमेवार्थं दृष्टान्तेन द्रढयन्नाह—

यथा हि सोमसंयोगाच्चमसो मेध्य उच्यते।
अपां तथैव संयोगान्नित्यो मेध्यः कमण्डलुः ॥ ५ ॥

अनु०—जिस प्रकार सोमरस के संयोग से यज्ञिय पात्र चमस को पवित्र बताया जाता है, उसी प्रकार जल के संयोग से कमण्डलु भी सदैव पवित्र रहता है ॥ ५ ॥

मेधो यज्ञः, तदर्हो मेध्यः ॥ ५ ॥

यस्मात् 'कमण्डलूदकेनाऽभिषिक्तपाणिपादो यावदार्द्रं तावदशुचिः परेषां' ( १. ४. १४ ) इत्युक्तं, तस्मात्—

पितृदेवाग्निकार्येषु तस्मात्तं परिवर्जयेत् । ६ ॥

अनु०—इस कारण पितृ, देव तथा अग्नि संबन्धी कार्यों में कमण्डलु का प्रयोग नहीं करना चाहिए ॥ ६ ॥

टि०—इस सूत्र का निर्देश उपर्युक्त षष्ठ खण्डान्तर्गत सूत्र १५ की ओर है, जिसमें कमण्डलु से हाथ-पैर धोने पर उनके गीले रहने तक अशुद्धि मानी गयी है।

कमण्डलूदकं यस्माच्छुद्धिकारणम्—

तस्माद्विना कमण्डलुना नाऽध्वानं व्रजेन्न सीमान्तं न गृहाद्-गृहम् ॥ ७ ॥

अनु०—( चूँकि कमण्डलु शुद्धि के लिए आवश्यक है ) इस कारण कमण्डलु के बिना यात्रा नहीं करनी चाहिए, ग्राम की सीमा की ओर नहीं जाना चाहिए और न एक घर से दूसरे घर को ही जाना चाहिए ॥ ७ ॥