बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 97, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने चतुर्थोऽध्यायः ४५
मूत्रोत्सर्गादेरनियतकालत्वात् ॥ ७ ॥
पदमपि न गच्छेदिषुमात्रादित्येके ॥ ८ ॥
यदिच्छेदधर्मसन्ततिमिति बौधायनः ॥ ६ ॥
अनु०—कुछ आचार्यों का मत है कि कमण्डलु के बिना बाण की दूरी से एक पद भी आगे नहीं जाना चाहिए ॥ ८ ॥
अनुं०—बौधायन का मत है कि यदि अपने धर्म का अनवरत पालन करता रहनी चाहे तो कमण्डलु के बिना कहीं न जाये ॥ ९ ॥
सन्ततिरविच्छेदः ॥ ९ ॥
ऋग्विधमृग्विधानं वाग्वदति ऋग्विधमृग्विधानं वाग्वदति ॥ १० ॥
अनु०—इस विषय में वाक् (ब्राह्मण ग्रन्थ) के अनुसार एक ऋचा भी (कमण्डलुविषयक नियम की) पुष्टि करती है ॥ १० ॥
टि०—गोविन्द स्वामी ने वाक् का अर्थ ब्राह्मण किया है और इस सन्दर्भ में “तस्यैषा भवति । यत्ते शिल्पं कश्यपरोचनावत्” उद्धृत किया है।
संभवतः कमण्डलु की शुद्धि-अशुद्धि एवं धार्मिक कर्मों के लिए उसकी उपयोगिता पर इस धर्मसूत्र में अन्य धर्मसूत्रों की अपेक्षा अधिक सामग्री प्रस्तुत की गयी।
वागिति ब्राह्मणमुच्यते । अस्मिन्नर्थे ऋगप्यस्तीति ब्राह्मणमाहेत्यर्थः । स यथा—'तस्यैषा भवति । यत्ते शिल्पं कश्यप रोचनावत्' इति ॥ १० ॥
इति प्रथमप्रश्ने चतुर्थाध्याये सप्तमः खण्डः
प्रथमप्रश्ने पञ्चमाध्याये अष्टमः खण्डः
कमण्डलुशौचप्रसङ्गेनाऽन्यद्रव्यविषयमपि शौचमारभ्यते—
अथाऽतश्शौचाधिष्ठानम् ॥ १ ॥
अनु०—अब शुद्धि के दूसरे कारणों या साधनों का वर्णन किया जाता है ॥ १ ॥
अधिष्ठानं निधानं कारणमित्यनर्थान्तरम् । शोध्यद्रव्यं वा ॥ १ ॥
अद्भिश्शुद्ध्यन्ति गात्राणि बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति ।
अहिंसया च भूतात्मा मनस्सत्येन शुध्यतीति ॥ २ ॥
अनु०—जल से शरीर शुद्ध होता है, बुद्धि ज्ञान से शुद्ध होती है; अहिंसा से भूतात्मा पवित्र होता है और मन सत्य से शुद्ध होता है ॥ २ ॥