बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)
Bawan Kasni
सद्गुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: Sant Ashram Ranjari 2015 Edition · Sant Ashram Ranjari, Samba (J&K)
पृष्ठ 12, कुल 122 में से
संदर्भ में पढ़ें10 साहिब बन्दगी
दोनों युद्ध के लिए तैयार हो गए। इतने में एक अद्भुत प्रकाश हुआ एवं आकाशवाणी हुई, “उठाओ पर्दा नहीं है मुर्दा, ऐ मुर्ख नादाना तुमने हमको नहीं पहचाना”। जब चादर उठाई गई तो कमल के फूल मिले, पार्थिक शरीर नहीं। यह कार्य कबीर साहिब ने लाखों लोगों के सामने सरअंजाम दिया। हिन्दुओं ने फूल लेकर समाधि बनाई, मुसलमानों ने चादर लेकर मज़ार। यह दोनों आज भी मगहर में उस महान पुरुष की गवाही दे रहे हैं कि ओ संसार के लोगो वह मानव नहीं, स्वयं पूर्ण परम पुरुष थे। भाईयों आप मेरे तर्क पर विचार करें कि इसमें कितना सत्य एवं ज्ञान है। इससे पहले इस संसार में किसी भी काल में किसी ने अपना शरीर विदेह नहीं किया। यह अपने आप में प्रथम एवं अन्तिम कौतुक है जो साहिब ने संसार को दिखाया। उनकी वाणी हमेशा संसार को दिशा एवं सर्वशक्तिमान तक जाने का रास्ता देगी। वर्तमान परिवेश में उनके सिद्धान्त संसार को शान्ति एवं सत्य के मार्ग की ओर ले जाने को सर्वथा उपयुक्त हैं।
संतों की नजर में साहिब
वाह वाह कबीर के गुरु पूरा है, वाह वाह कबीर गुरु पूरा है।
पूरे गुरु के मैं बलि जौहों, जाका सकल जहूरा है॥
अव्वल संत कबीर हैं, दूजै रामानन्द।
तासे भक्ति प्रगट भई, सात दीप नव खण्ड॥
यक अर्ज गुफतम पेश, तू दर गोश कुन करतार।
हक़्क़ा कबीर करीम तू, बेएब परवर दिगार॥
—गुरु नानक देव जी
बहुत जीव अटक रहे, बिन सतगुरु भव माहिं।
दादू नाम कबीर बिन, छूटे ऐकों नाहिं॥
दादू बैठि जहाज पर, गये समुद्रतीर।
जल में मच्छी जो रहें, कहे कबीर कबीर॥
कोई सगुन में रीझ रहा, कोई निर्गुण ठहराय।
अटपट चाल कबीर की, मोसे कही न जाय॥
—दादू दयाल जी