भारतकोश
बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished151 पृष्ठ

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गरुड़ ऐसा सोच ही रहा था कि जीमूतवाहन बोला—'‘रुक क्यों गए पक्षिराज। मुझे खाओ और अपनी क्षुधा शांत करो। अभी तो मेरे शरीर का काफी हिस्सा शेष है। ' '

यह सुनकर गरुड़ को बहुत आश्चर्य हुआ। वह बोला—'‘हे महात्मन, कौन हैं आप ? सर्प तो आप हो ही नहीं सकते, फिर आप कौन हैं ? कृपा करके मुझे अपना परिचय दें।' '

जीमूतवाहन ने उत्तर में कहा—'‘यह तुम्हारा कैसा प्रश्न है गरुड़ ? मैं तुम्हारा भक्ष्य हूं और कुछ भी नहीं। अतः निर्मम होकर मेरा भक्षण करो।

जीमूतवाहन जब गरुड़ से यह बातें कर रहा था, उसी समय शंखचूड़ उन्हें खोजता हुआ वहां आ पहुंचा। उसने दूर से ही गुहार लगाई—'‘रुको विनता पुत्र। इसे खाकर कलंक के भागी मत बनो। यह तुम्हारा भक्ष्य नहीं है, तुम्हारा भक्ष्य तो मैं हूं, एक नागपुत्र।' '

यह कहता हुआ वह दौड़कर वहां पहुंचा और उन दोनों के बीच खड़ा हो गया। गरुड़ को चक्कर में पड़ा देखकर शंखचूड़ ने पुनः कहा—'‘किसी भ्रम में मत पड़ो विनता पुत्र। तुम जिसे अपना भक्ष्य समझकर उठा लाए हो, वह तो एक महान आत्मा, महान परोपकारी, विद्याधरों का राजा जीमूतवाहन है। तुम्हारा असली शिकार तो मैं हूं। यह देखो मेरी दो जुबानें और मेरा फन...।' ' ऐसा कहकर शंखचूड़ ने अपनी दोनों जुबानें और अपना फन उसे दिखाया।

जब शंखचूड़ गरुड़ को अपना फन दिखा रहा था, ठीक उसी समय जीमूतवाहन की पत्नी और उसके माता-पिता भी वहां आ पहुंचे और जीमूतवाहन के क्षत-विक्षत शरीर को देखकर हाहाकार करने लगे।

यह सब जानकर गरुड़ को भारी पश्चाताप हुआ। वह अपने मन में सोचने लगा कि 'हाय ! मैने भ्रम में पड़कर बोधिसत्व के इस अंश को कैसे खा लिया ? यह तो दूसरों को प्राण देने वाला वही जीमूतवाहन है जिसका यश तीनों लोकों में फैला हुआ है। अतः अब यदि इसकी मृत्यु हो गई तो मुझ पापी को अग्नि में प्रवेश करना पड़ेगा, क्योंकि अधर्म रूपी विष-वृष का फल पककर भला मीठा कैसे हो सकता है?''

गरुड़ जब इस प्रकार पश्चाताप कर रहा था, तभी जीमूतवाहन ने अपने माता-पिता एवं पत्नी की ओर देखा। एकाएक उसका शरीर जोर से कांपा और उसके प्राण पखेरू उड़ गए।

अपने पुत्र को मृत समझकर जीमूतवाहन के माता-पिता आर्तनाद करने लगे। शंखचूड़ भी स्वयं को बार-बार कोसने लगा कि उसी के कारण इस महात्मा की जान गई। उसकी पत्नी मलयवती आंखों में आंसू भरकर आकाश की ओर देखती हुई उस अम्बिका को उलाहना देने लगी जिसने प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया था। वह बोली—'‘हे देवी, उस समय तो आपने मुझे यही वरदान दिया था कि तुम्हारा पति

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