भारतकोश
बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished151 पृष्ठ

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विद्याधरों का चक्रवती राजा होगा। फिर अब आपका वह वरदान असत्य कैसे हो गया, मां!''

मलयवती जब बार-बार ऐसा कहकर रुदन कर रही थी, तभी वहां प्रकाश-सा फैला और साक्षात् देवी अम्बिका वहां प्रकट हो गई। मां अम्बिका ने कहा—''बेटी, मेरी बात झूठी नहीं है। लो मैं तुम्हारे पति को पुनः जीवित किए देती हूं।'' ऐसा कहकर मां अम्बिका ने अपने कमंडल के अमृत से जीमूतवाहन के अस्थिपंजर को सींच दिया।

जीमूतवाहन जीवित हो उठा, उसके कटे-फटे अंग पुनः जुड़ गए और वह पहले से भी अधिक सुंदर व कांतिमान बन गया। जीमूतवाहन ने तब देवी मां को प्रणाम किया। औरों ने भी उसका अनुसरण किया। तब देवी मां ने उससे कहा—''पुत्र जीमूतवाहन, मैं तुम्हारे देहदान से परम संतुष्ट हूं इसलिए अपने हाथों से मैं तुम्हारा चक्रवर्ती पद पर अभिषेक करती हूं। तुम एक कल्प तक विद्याधरों पर राज्य करोगे।''

यह कहकर देवी ने कलश के जल से जीमूतवाहन का अभिषेक किया। फिर वह अन्तर्ध्यान हो गई।

उसी समय वहां फूलों की वर्षा हुई और आकाश में उपस्थित देवताओं की दुन्दभियां बजने लगीं।

अब गरुड़ ने विनीत होकर जीमूतवाहन से कहा—''हे चक्रवर्ती, मैं आपके अपूर्व पराक्रम से बहुत प्रसन्न हूं। तुमने जो कुछ किया है, वह तीनों लोकों को अचरज में डालने वाला है। इस कृत्य से तुमने अपना नाम ब्रह्मांड की भित्ति पर लिख दिया है। अतः आप मुझे आज्ञा दीजिए और मेरे द्वारा कोई वर प्राप्त कीजिए।''

इस पर जीमूतवाहन ने कहा—''हे पक्षिराज ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो आप वचन दीजिए कि आज से फिर आप सर्पों का भक्षण न करेंगे। साथ ही ये भी कि जिन सर्पों को आप खा चुके हैं और जिनकी हड्डियां ही शेष रही हैं, उन्हें भी पुनः जीवनदान देंगे।'' तब गरुड़ ने ऐसा ही वचन दिया। साथ ही मृत सर्पों को भी फिर से जीवित कर दिया।

गौरी की कृपा से सभी विद्याधरों ने जीमूतवाहन के इस अद्भुत कृत्य की बात जान ली। कुछ ही देर में वे सभी राजा वहां आ पहुंचे। उन्होंने जीमूतवाहन के चरणों में झुककर प्रणाम किया। जीमूतवाहन ने जब गरुड़ को विदा कर दिया, तब वे उसके संबंधियों और मित्रों सहित उसे हिमालय पर्वत पर ले गए, जहां पार्वती ने अपने हाथों अभिषेक करके उसे चक्रवर्ती का पद दिया।

जीमूतवाहन ने अपने माता-पिता, मित्रावसु, मलयवती तथा घर जाकर लौटे हुए शंखचूड़ के साथ रहते हुए, बहुत दिनों तक चक्रवर्ती सम्राट का पद संभाला। उसका साम्राज्य उन रत्नों से भरपूर था, जिन्हें उसने अपने अलौकिक कार्यों द्वारा अद्भुत रूप से प्राप्त किया था।

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