बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा
पृष्ठ 140, कुल 151 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेईसवां बेताल
अघोरी तपस्वी की कथा
भूत-प्रेतो से भरे उस महाश्मशान में राजा विक्रमादित्य फिर से उस शिंशपा-वृक्ष के नीचे पहुंचा। यद्यपि बेताल ने अपने अनेक रूप दिखलाए किंतु राजा ने उसे वृक्ष से नीचे उतार लिया और उसे अपने कंधे पर लादकर चुपचाप मार्ग पर चलते रहे। तब बेताल ने राजा विक्रमादित्य से कहा—"राजन ! न करने योग्य इस काम में भी तुम्हारा ऐसा आग्रह है, जिसे रोका नही जा सकता। अतः मैं तुम्हारी थकावट दूर करने के लिए एक अन्य कथा सुनाता हूं, सुनो।"
कलिंगा देश में स्वर्गपुरी के समान भव्य नगरी थी, जहां उत्तम आचरण वाले लोग रहते थे। वहां ऐश्वर्य और पराक्रम के लिए प्रद्युम्न के समान प्रसिद्ध, प्रद्युम्न नाम का राजा शासन करता था। उस नगर के एक छोर पर यज्ञस्थल नाम का एक गांव था जिसे राजा प्रद्युम्न ने ब्राह्मणों को दान स्वरूप दिया था। उसी गांव में यज्ञसोम नाम का एक वेदज्ञ ब्राह्मण भी रहता था, जो अत्यंत धनवान था। वह अग्निहोत्री था तथा अतिथि-देवों का सम्मान करने वाला था।
जब उस ब्राह्मण का यौवन बीत गया, तब सौ-सौ मनोरथों के बाद, उसके ही योग्य उसकी पत्नी के एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उत्तम लक्षणों वाला वह बालक पिता के घर में बढ़ने लगा। ब्राह्मणों ने विधिपूर्वक उसका नाम देवसोम रखा। वह बालक, जिसने अपनी विद्या, विनय आदि गुणों से लोगों को वशीभूत कर लिया था, जब सोलह वर्ष का हुआ, तब अचानक ज्वर के कारण मृत्यु को प्राप्त हो गया। उसके पिता यज्ञसोम ने स्नेह के कारण अपनी पत्नी सहित उस मरे हुए पुत्र को आलिंगन में बांधे रखा और बहुत देर तक उसके शव को दाह-क्रिया के लिए नहीं जाने दिया।
बाद में, वहां इकट्ठे हुए बड़े-बूढ़ों ने उसे इस प्रकार समझाया—"ब्राह्मण, आप तो भूत और भविष्य को जानने वाले हैं। आप क्या जल के बबूले के समान क्षण-भंगुर इस संसार की गति नहीं जानते ? इस संसार में ऐसे भी राजा थे, जो उन मनोहर राजमहलों में रत्नजडित पलंगों पर बैठते, जहां संगीत की झंकार भरी रहती थी, अपने शरीर पर चन्दन का लेप करते थे और अपने को अमर समझकर उत्तम स्त्रियों से घिरे रहते और सुख भोगते थे। ऐसे महापराक्रमियों को भी काल ने अपना ग्रास बना लिया। वे भी अकेले ही उस श्मशान में पहुंचे जहां उनके अनुयायी और प्रेत रो रहे थे और आसपास शृगाल चीत्कार कर रहे थे। चिता पर सोये उनके शरीर का मांस भी पक्षी, पशुओं और अग्नि ने खा डाला। जब उन्हें भी मरने और नष्ट होने से कोई नहीं बचा सका, तब और की तो बात ही क्या है ? अतः हे विद्वान ! तुम यह
बेताल पच्चीसी ⊐ 141