बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबतलाओ कि कि इस शव को कलेजे से लगाए रखकर तुम क्या करोगे ?"
इस तरह समझाने-बुझाने के बाद किसी तरह अपने मरे हुए पुत्र को छोड़ा और शव को नहलाया-धुलाया। तब उसे एक पालकी में रखकर, आंसू बहाते तथा रोते-पीटते वे बन्धु-बांधव, जो वहां इकट्ठे थे, श्मशान ले गए।
उस श्मशान में कुटिया बनाकर एक बूढ़ा तपस्वी रहता था। वह पाशुपत मत का योगी (अघोरी) था। अधिक अवस्था और कठोर तपस्या के कारण उसका शरीर अत्यंत कृश हो गया था। जब वह चलता था तो ऐसा लगता जैसे अब गिरा कि तब गिरा।
उसका नाम शिव था। उसका सारा शरीर भस्म लगे श्वेत रोमों से भरा हुआ था। उसका पीला जटाजूट बिजली के समान जान पड़ता था। वह स्वयं दूसरे शिव जैसा प्रतीत होता था।
उस तपस्वी के साथ उसकी कुटिया में एक शिष्य भी रहता था। योगी ने कुछ ही देर पहले उसे बुरा-भला कहा था, जिससे वह चिढ़ा हुआ था। वह मूर्ख और दुष्ट था। ध्यान और योग आदि क्रियाओं में लगा रहने के कारण उसे अहंकार हो गया था। वह भीख में मिले हुए अन्न को खाकर निर्वाह करता था। बाहर दूर से आते हुए इस जन-कोलाहल को सुनकर योगी ने उससे कहा—"बाहर जाकर झटपट यह तो देखकर आओ कि इस श्मशान में ऐसा शोरगुल क्यों हो रहा है, जैसा इससे पहले कभी नहीं सुना गया।"
गुरु के ऐसा कहने पर उस शिष्य ने उत्तर दिया—"मैं नहीं जाऊंगा, आप ही जाइए। मेरी भिक्षा की बेला बीती जा रही है।"
यह सुनकर योगी बोला—"अरे पेटू, धिक्कार है तुझे। आधा दिन बीत जाने पर यह तेरी कैसी भिक्षा की बेला है ?"
इस पर उस क्रुद्ध तपस्वी ने कहा—"अरे बुड्ढे, धिक्कार मुझे नहीं तुझ पर है। आज से न तो मैं तेरा शिष्य हूं और न तू मेरा गुरु। मैं दूसरी जगह जा रहा हूं। तू संभाल अपना यह कमंडल।" यह कहकर वह उठा और उस तपस्वी के सम्मुख दंड-कमंडल रखकर वहां से चलता बना।
कुछ देर बाद, वह तपस्वी हंसता हुआ अपनी कुटिया से बाहर निकलकर वहां पहुंचा जहां ब्राह्मणकुमार को दाह-कर्म के लिए लाया गया था। उसने देखा कि लोग तरुणाई के द्वार पर खड़े उस बालक के लिए शोक कर रहे हैं। बुढ़ापे से क्षीण उस योगी ने बालक के शरीर में प्रवेश करने का निश्चय किया। झटपट एकान्त में जाकर पहले तो वह जी खोलकर रोया, फिर अंगों के उचित संचालन के साथ शीघ्रता से नाचने लगा। पल-भर बाद यौवन की इच्छा रखने वाले उस तपस्वी ने अपना शरीर छोड़कर उस ब्राह्मण-पुत्र के शरीर में प्रवेश किया।
बात ही बात में सजाई हुई चिता पर वह ब्राह्मण-पुत्र जीवित होकर जम्हाई लेता हुआ उठ बैठा। यह देखकर वहां उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए। ब्राह्मण-पुत्र के
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