बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकहकर उसकी प्राण-रक्षा करे, अन्यथा मैं भी उसके पीछे अपने प्राण त्याग दूंगी।''
यह सुनकर वणिक को बहुत आश्चर्य हुआ। उसने अपनी पुत्री से कहा—‘‘पुत्री यह तुम क्या कह रही हो ? तुम तो उन राजाओं को भी अपना पति नहीं बनाना चाहती जो तुम्हारी कामना करते रहते हैं। फिर भी तुम विपत्ति में पड़े हुए इस दुष्ट चोर की इच्छा कैसे कर रही हो ?’’
वणिक ने अपनी पुत्री को बहुत समझाया कि वह उस चोर को पति रूप में पाने की अपनी हठ छोड़ दे किंतु रलावती टस-से-मस न हुई और वह बार-बार अपने प्राण त्यागने की धमकी देती रही।
तब वह वणिक शीघ्रता से राजा के पास पहुंचा और अपना सब देकर भी राजा से उस चोर की मुक्ति मांगी। किंतु राजा ने सौ-करोड़ स्वर्ण मुद्राओं के बदले भी उस चोर को मुक्त करने से स्पष्ट इन्कार कर दिया। वणिक असफल होकर घर लौटा और जब उसने राजा के इन्कार के बारे में रलावती को बताया तो वह हठीली भी सबके समझाने-बुझाने के बाद भी चोर के साथ ही मरने को तैयार हो गई।
वह स्नान करके एक पालकी में बैठकर वध-भूमि में गई। पीछे-पीछे रोते हुए उसके माता-पिता एवं बंधु-बांधव भी वध-भूमि में पहुंच गए।
इसी बीच वधिकों (जल्लादों) ने चोर को सूली पर चढ़ा दिया था। सूली पर टंगे हुए उसके प्राण छटपटा रहे थे, तभी अपने कुटुम्बियों के साथ आती हुई रलावती पर उसकी निगाह पड़ी। लोगों से उसका वृत्तांत सुनकर उस चोर ने क्षण-भर तो आंसू बहाए, फिर वह खिलखिलाकर हंस पड़ा और ऐसी ही अवस्था में उसने अपने प्राण त्याग दिए।
बाद में उस साध्वी वणिक-पुत्री ने उस चोर के शरीर को सूली पर से उतरवाया और उसे लेकर श्मशान भूमि में उसके साथ चिता में जलने के लिए बैठ गई।
उसी समय आकाशवाणी और उस श्मशान में भगवान शिव ने अदृश्य रूप पहुचकर कहा—‘‘पतिव्रते ! स्वयं मरे हुए इस पति के प्रति तुमने जो भक्ति दिखलाई है, उससे मैं संतुष्ट हुआ हूं, अतः मुझसे कोई वर मांगो।’’
यह सुनकर रलावती ने देवाधिदेव महादेव को प्रणाम करके उनसे यह वर मांगा—‘‘हे देव ! मेरे पिता का कोई पुत्र नहीं है, उनको सौ पुत्रों की प्राप्ति हो। मेरे अतिरिक्त उनके यहां कोई संतान नहीं है अतः मेरे बिना वे जीवित नहीं रहेंगे।’’
उस साध्वी के ऐसा कहने पर भगवान शिव उससे पुनः बोले—‘‘तुम्हारे पिता को सौ पुत्र प्राप्त होंगे लेकिन तुम कोई दूसरा वर मांगो क्योंकि तुम्हारे जैसी वीर हृदय के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं है।‘’
यह सुनकर उसने कहा—‘‘हे प्रभु ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरे पति जीवित हो जाएं और धर्म में इनकी मति स्थिर रहे।‘’
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