भारतकोश
बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished151 पृष्ठ

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‘‘ऐसा ही होगा। तुम्हारा पति अक्षत शरीर जी उठे, धर्म में इसकी मति स्थिर रहे और राजा वीरकेतु इस पर प्रसन्न हो।’’ आकाश से अदृश्य रूप में स्थित भगवान शिव ने ज्योंही ऐसा कहा, त्योंही वह चोर अक्षत अक्षत शरीर जीवित होकर उठ बैठा।

यह देख वणिक रलदत्त विस्मित भी हुआ और प्रसन्न भी। वह प्रसन्नतापूर्वक अपनी पुत्री और जमाता को अपने बंधु-बांधवों सहित अपने घर ले गया। बाद में, पुत्र प्राप्ति का वर पाये हुए रलदत्त ने प्रसन्नतापूर्वक खूब धूमधाम से एक उत्सव का आयोजन किया, जिसमे उसने राजा सहित पूरे नगर को भोज के लिए आमंत्रित किया।

जब राजा ने यह समाचार सुना तो संतुष्ट होकर उसने चोर को बुलाकर अपना सेनापति बना दिया। उस अद्वितीय वीर चोर ने भी चोरी की वृत्ति छोड़ दी और उस वणिक-पुत्री से विवाह करके, राजा के अनुकूल रहकर सन्मार्ग अपना लिया।

राजा को यह कथा सुनाकर और उसे शाप का भय दिखाकर, उसके कंधे पर बैठे बेताल ने पूछा—‘‘राजन, अब तुम यह बताओ कि उस वणिक-पुत्री को अपने माता-पिता के साथ आई देखकर सूली पर टंगा हुआ वह चोर पहले रोया क्यों और फिर हंसा क्यों ?’’

राजा ने उत्तर में कहा—‘‘बेताल ! वह चोर रोया तो इस दुख से था कि ‘यह वणिक जो मेरा अकारण बंधु बना, उससे मैं उऋण नहीं हो सका और हंसा इस विस्मय से कि ‘पति रूप में राजाओं का भी तिरस्कार करने वाली यह कन्या, ऐसी स्थिति में पड़े हुए मेरे प्रति कैसे अनुरक्त हो गई ?’ सच है, स्त्री का चित्त बड़ा विचित्र होता है।’’

राजा से अपने प्रश्न का सटीक उत्तर पाकर वह मायावी बेताल अपनी शक्ति के द्वारा राजा के कंधे से उतरकर पुनः शिशपा-वृक्ष की ओर उड़ गया। राजा भी पहले ही की तरह उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।

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