बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंके यह अपूर्व लक्षण हैं। मैं तो इसका अनुभव कर चुकी हूं पर तुमसे मैने नही कहा। ’’
उसके ऐसा कहने पर मृगांकवती धीरे से बोली—‘‘सखी, तुम मेरे प्राणो के समान मुझे प्रिय हो। तुम समय को भी पहचानती हो। अतः मैं तुमसे क्या छिपाऊ। किसी प्रकार से यहां किसी पुरुष का प्रवेश हो पाता, तो अच्छा था। ’’
मृगांकवती के ऐसा कहने पर धूर्त मनःस्वामी उसका आशय समय गया और बोला—‘‘यदि तुम्हारी ऐसी ही इच्छा है तो तुम चिन्ता मत करो सखी। भगवान विष्णु की कृपा से मुझे एक ऐसा वरदान प्राप्त है कि मै अपनी इच्छा से जब चाहूं स्त्री बन जाऊ और जब चाहू पुरुष। अगर तुम चाहती हो तो मैं तुम्हारे लिए पुरुष बन जाती हू। ’’
ऐसा कहकर मनःस्वामी ने अपने मुख से गोली निकाल ली और उसने यौवन से उद्दीप्त अपना सुन्दर पुरुष-रूप उसे दिखलाया। इस तरह जब वे एक-दूसरे का विश्वास प्राप्त कर चुके और उनकी सारी यन्त्रणाए जाती रहीं तो समय के अनुसार वे सुख-भोग करने लगे। अनन्तर, मंत्रीपुत्र की उस भार्या के साथ वह ब्राह्मण दिन को स्त्री और रात को पुरुष बनकर भोग-विलास मे लिप्त रहने लगा।
कुछ समय बाद मंत्रीपुत्र के लौटने का समय निकट आया, तो जान-बूझकर मनःस्वामी मृगांकवती के साथ रात के समय भागकर चला गया। इन्हीं घटनाओं के बीच, सारा वृत्तांत सुनकर उसका गुरु मूलदेव बूढ़े ब्राह्मण के रूप मे वहां फिर आया। उसके साथ युवक ब्राह्मण के रूप में उसका मित्र शशि भी आया। मूलदेव ने आकर राजा यशःकेतु से नम्रतापूर्वक कहा—‘‘मै अपने पुत्र को ले आया हूं राजन। अब मेरी बहू मुझे लौटा दीजिए। ’’
तब शाप के भय से डरे हुए राजा ने सोच-विचार के साथ कहा—‘‘हे ब्राह्मण, आपकी बहु तो न जाने कहां चली गई, अतः आप मुझे क्षमा करे। अपने अपराध के कारण मैं आपके पुत्र के लिए अपनी कन्या देता हूं। ’’
इस पर बूढ़ा ब्राह्मण धूर्तराज मूलदेव उसे बुरा-भला कहने लगा और उस पर वादे से मुकरने का आरोप लगाने लगा। अन्ततः किसी प्रकार राजा के अनुनय-विनय करने पर वह शांत हुआ और शशिप्रभा का विवाह अपने बनावटी बेटे के साथ होना स्वीकार कर लिया।
धूर्त मूलदेव नवविवाहिता वर-वधू को साथ लेकर अपने स्थान के लिए चल पड़ा। उसने राजा से धन की इच्छा नहीं की। बाद में जब मनःस्वामी वहां आया, तब उसके और शशि के बीच झगड़ा उत्पन्न हुआ। मनःस्वामी ने कहा—‘‘शशिप्रभा को मुझे दे दो। गुरु की कृपा से इस कन्या को पहले मैंने ही ब्याहा था। ’’
शशि बोला—‘‘मूर्ख, तू इसका कौन है ? यह तो मेरी स्त्री है। इसके पिता ने अग्नि को साक्षी मानकर इसको मुझे सौंपा है। ’’
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