बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपिताश्री ! इस संसार मे एकमात्र परोपकार ही चिरस्थायी है, जो धैर्य और यश का जन्मदाता है तथा युगों तक उसका साक्षी बना रहता है। तब फिर ऐसे क्षणिक सुखों के लिए हमने ऐसे देवतुल्य परोपकारी कल्पवृक्ष को व्यर्थ ही क्यो रख छोड़ा है ? जरा सोचिए पिताश्री, जिन हमारे पूर्वजों ने इसे 'मेरा है, मेरा है' कहते हुए रख छोड़ा था, आज वे कहा है ? जबकि यह परोपकारी वृक्ष आज भी मौजूद है।"
“तुम क्या कहना चाहते हो पुत्र ?” जीमूतवाहन की बात सुनकर उसके पिता ने भ्रमित होकर पूछा।
इस पर जीमूतवाहन ने कहा—"पिताश्री ! यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं मनोरथ पूर्ण करने वाले इस देववृक्ष का उपयोग परोपकार की फल-सिद्धि के लिए करूँ ?”
पुत्र की इच्छा जानकर जीमूतकेतु ने उसे ऐसा करने की आज्ञा प्रदान कर दी। तब जीमूतवाहन ने उस कल्पवृक्ष के समीप जाकर कहा—"हे देव ! तुमने हमारे पूर्वजो की सभी मनोकामनाएं पूरी की हैं लेकिन मेरी भी एक मात्र मनोकामना पूरी कर दो। कुछ ऐसा करो जिससे मै इस पृथ्वी को दरिद्रतारहित देख सकूं। जाओ, तुम्हारा कल्याण हो, मै धन की इच्छा रखने वालों के लिए तुम्हारा विसर्जन करता हूं।"
युवराज ने हाथ जोड़कर जब यह कहा तो उस वृक्ष से आवाज आई—"तुम धन्य हो राजकुमार। तुम्हारे त्याग की मैं सराहना करता हूं। तुम्हारे पूर्वज मुझे देवताओं से मांगकर लाये थे, इसलिए मैं अब तक वचनबद्ध था। अब तुमने मेरा त्याग कर दिया है तो मैं जाता हूं। तुम्हारा कल्याण हो।" पल-भर बाद ही वह वृक्ष आकाश में उड़ गया और उसने पृथ्वी पर इतना धन बरसाया कि वहां कोई भी गरीब न रहा। जीमूतवाहन के ऐसा करने से उसका यश तीनों लोकों में फैल गया। लोग उसके नाम की जय-जयकार करने लगे।
लेकिन जीमूतवाहन का कल्पवृक्ष को विसर्जन करना उसके बंधु-बांधवों का रास न आया। वे लोग उससे ईर्ष्या करने लगे। उन्होंने एकत्र होकर सोचा कि विपत्तियों का नाश करने वाला कल्पवृक्ष तो अब उनके पास रहा नहीं, उसे तो जीमूतवाहन ने लोक कल्याण के लिए दे डाला, अतः अब कंचनपुर पर सहज ही अधिकार किया जा सकता है। ऐसा सोचकर वे कचनपुर को अधिकार में लेने के लिए युद्ध की तैयारियां करने लगे।
यह देखकर जीमूतवाहन ने अपने पिता से कहा—"पिताश्री, मैं आपके शौर्य को भली-प्रकार जानता हूं। विश्व में ऐसा कौन है जो शूरता में आपका सामना कर सके किंतु सगे-संबंधियों को मारकर इस पापमय और नाशवान शरीर से राजसुख का उपभोग करना सर्वथा अनुचित है। अतः हमें स्वेच्छा से इस राज्य को त्यागकर कहीं अन्यत्र चल देना चाहिए।"
इस पर उसके पिता ने कहा—"पुत्र, मैं तो तुम्हारे लिए ही इस राज्य की
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