भारतकोश
बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished151 पृष्ठ

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कामना करता था। जब तुम स्वयं ही इसके त्याग की बात कह रहे हो तो मुझे राज्य का प्रलोभन कैसे हो सकता है। अतः जैसा तुम उचित समझो, वैसा ही करो।''

इस प्रकार जीमूतवाहन अपना राज्य छोड़कर अपने माता-पिता को साथ लेकर मलय पर्वत पर चला गया और चन्दनवन से ढके हुए एक झरने के पास वाली कंदरा में आश्रम बनाकर रहने लगा। वहां विश्वावसु नाम के सिद्धों के राजा रहते थे। उनके पुत्र मित्रावसु से जीमूतवाहन की मित्रता हो गई।

एक बार घूमता-फिरता जीमूतवाहन, उपवन में स्थित भवानी गौरी का मंदिर देखने के लिए गया। वहां उसने सखियों सहित एक उत्तम कन्या को देखा जो भगवती गौरी को प्रसन्न करने के लिए वीणा बजा रही थी। उस अप्सराओं को भी मात करने वाली कन्या का रूप-सौंदर्य देखकर जीमूतवाहन ठगा-सा रह गया। पहली ही निगाह में उस तन्वेगी (सुकुमारी) ने उसका हृदय चुरा लिया। वह कन्या भी कामदेव जैसे सुन्दर जीमूतवाहन को देखकर उस पर मोहित हो गई। वह एकटक उसी की ओर देखने लगी जिससे उसकी वीणा भी विकल आलाप करने लगी।

अनन्तर, जीमूतवाहन ने उसकी एक सखी से उस कन्या का नाम और उसका वंश पूछा। कन्या की सखी ने बताया कि उसका नाम मलयवती है और वह सिद्धो के राजा विश्वावसु की पुत्री तथा मित्रावसु की बहन है। तब उस सखी ने जीमूतवाहन से उसका नाम एवं वंश पूछा। यह जानने पर कि जीमूतवाहन विद्याधरों का राजा है, उसे बहुत खुशी हुई। उसने मलयवती के पास जाकर कहा—‘‘सखी, विश्व में पूजे जाने योग्य महान विद्याधरों के राजा यहां पधारे हैं, तुम्हें आगे बढ़कर उनका स्वागत करना चाहिए।’’

इस पर मलयवती मौन ही रही। लज्जावश उसके कदम आगे न उठ सके। तब उस सखी ने जीमूतवाहन से कहा—‘‘मेरी यह सखी लजा रही है, अतः आप मुझसे ही यह सत्कार ग्रहण करें।’’ ऐसा कहकर उसने एक पुष्पमाला जीमूतवाहन के गले में पहना दी।

तभी एक दासी ने उस सिद्धकन्या के पास आकर बताया—‘‘राजकुमारी, आपकी माता जी आपको याद कर रही है। चलिए, विलम्ब मत कीजिए।’’ तब मलयवती अनमने-से भाव से जीमूतवाहन की ओर देखती हुई वहां से चल पड़ी। उसके कदमों से ऐसा लग रहा था जैसे जीमूतवाहन के पास से वह विवशता में ही जा रही हो। जीमूतवाहन भी अपने आश्रम में लौट आया। उसका भी मन मलयवती में रमा हुआ था। घर आकर मलयवती अपनी माता से मिली और फिर अपने कक्ष में जाकर शय्या पर गिर पड़ी। उसके हृदय में कामाग्नि जल रही थी। उसकी आंखों में आंसू आ गए थे। उसकी सखियों ने उसके सन्ताप से भरे सारे शरीर पर चन्दन का लेप लगाया और कमल के पत्तों से पंखा झला। फिर भी, न तो वह सखियों की गोद में और न भूमि पर सोकर ही चैन पा सकी। रात-भर वह तड़पती ही रही। लज्जा के

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