भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ६८ | भैषज्यरत्नावली । | [ चिकित्सा- |
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उक्त सम्पूर्ण औषधियोंको मिलाकर बनाया हुआ क्वाथ विषमज्वरको दूर करता है ॥ ३६० ॥
मधुकादि ।
मधुकं चन्दनं मुस्तं धात्री धान्यमुशीर कम् ।
छिन्नोद्भवं पटोलं च क्वाथः समधुशर्करः ॥ ६१ ॥
ज्वरमष्टविधं हन्ति सन्तताद्यं सुदारुणम् ।
वातिकं पैत्तिकं चैव श्लैष्मिकं सान्निपातिकम् ॥ ६२ ॥
मुलहठी, लालचन्दन, नागरमोथा, आमले, धनियां, खस, गिलोय और परवल इनका क्वाथ शहद और खाँड मिलाकर पीनेसे सन्तत आदि आठ प्रकारके दारुण विषम ज्वरोंको तथा वात, पित्त, कफ इन भिन्नभिन्न तीनों दोषोंसे अथवा सन्निपातसे उत्पन्न होनेवाले ज्वरोंको शीघ्र नष्ट करता है ॥ ६१ ॥ ६२ ॥
मुस्तादि ।
मुस्तामलकगुडूचीविश्वौषधकण्टकारिकाक्वाथः ।
पीतः सकणाचूर्णः समधुर्विषमज्वरं हन्ति ॥ ६३ ॥
नागरमोथा, आमले, गिलोय, सोंठ और कटेरी इनके क्वाथमें पीपलका चूर्ण और शहद डालकर पान करनेसे विषमज्वर नष्ट होता है ॥ ६३ ॥
महाबलादि ।
महाबलामूलमहौषधाभ्यां क्वाथो निहन्याद्विषमज्वरं च ।
शीतं सकम्पं परिदाहयुक्तं विनाशयेद् द्वित्रिदिनप्रयुक्तः ॥ ६४ ॥
सहदेईकी जड़ और सोंठ दोनोंको समानभाग लेकर क्वाथ बनाकर पान करनेसे दो तीन दिनमें शीत, कम्प और दाहसहित विषमज्वर नष्ट होता है ॥ ६४ ॥
स्वल्पभार्ङ्ग्यादि ।
भार्ङ्ग्यब्दपर्पटकधान्ययवासविश्व-
भूनिम्बकुष्ठकणसिंह्यमृताकषायः ।
जीर्णज्वरं सततसन्ततकं निहन्या-
दन्येभवं त्रितयमाशु चतुर्थकं च ॥ ६५ ॥
भारंगी, नागरमोथा, पित्तपापड़ा, धनियां, धमासा, सोंठ, चिरायता, कूठ, पीपल, बडीकटेरी और गिलोय इन ओषधियोंका क्वाथ बनाकर पान करनेसे जीर्णज्वर, सततज्वर, सन्ततज्वर, अन्येद्युष्कज्वर, तृतीयक (तिजारी) और चतुर्थक (चौथिया) ज्वर दूर होता है ॥ ६५ ॥