भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ६७


विषमज्वरकी चिकित्सा ।

विषमाश्च ज्वराः सर्वे सन्निपातसमुद्भवाः ।
अथोल्बणस्य दोषस्य तेषु कार्यं चिकित्सितम् ॥ ५६ ॥

सब प्रकारके विषमज्वर सन्निपातसे उत्पन्न होते हैं, इसलिये जिस २ विषमज्वरमें जिस जिस दोषकी प्रबलता हो, उसी दोषको शमन करनेका उपाय करना चाहिये ॥ ५६ ॥

वातप्रधानं सर्पिर्भिर्वस्तिभिः सानुवासनैः ।
विरेचनं च पयसा सर्पिषा संस्कृतेन च ॥ ५७ ॥
विषमं तिक्तशीतैश्च ज्वरं पित्तोत्तरं जयेत् ।
वमनं पाचनं रूक्षमन्नपानं च लङ्घनम् ॥
कषायोष्णं च विषमे ज्वरे शस्तं कफोत्तरे ॥ ५८ ॥

घृतपान और अनुवासनवस्तिके द्वारा वातप्रधान विषमज्वरको शमन करे, पित्तप्रधान विषमज्वरमें प्रथम विरेचक (दस्तावर) ओषधियोंके द्वारा सिद्ध कियेहुए दुग्ध अथवा घृतका पान कराकर विरेचन करावे, फिर तिक्त और शीतल ओषधियोंके उपचारद्वारा पित्तजनित विषमज्वरकी चिकित्सा करे। कफाधिक्य विषमज्वरमें वमनकारक, पाचक और स्वच्छ अन्नपान एवं उष्ण ओषधियोंका क्वाथ देना और लंघन कराना उपयोगी है ॥ ५७ ॥ ५८ ॥

महौषधादि ।

महौषधग्रन्थिकतालपर्णीमार्कण्डिकारग्वधबालपथ्याः ।
सक्षारमेषां विषमज्वरे च हितं शृतं पाचनरेचनं च ॥ ५९ ॥

सोंठ, पीपलामूल, मुसली, भुई खवसा, अमलतास, सुगन्धवाला और हरड इन ओषधियोंका क्वाथ बनाकर उसमें जवाखार डालकर पान करावे। यह क्वाथ पाचक रेचक और विषमज्वरमें हितकारी है ॥ ५९ ॥

पटोलादि ।

पटोलयष्टीमधुतिक्तरोहिणीघनाभयाभिर्विषमज्वरघ्नः ।
कृतः कषायस्त्रिफलामृतावृषैः पृथक्पृथग्वा विषमज्वरापहः ॥

परवल, मुलहठी, कुटकी, नागरमोथा और हरड इन ओषधियोंका क्वाथ अथवा हरड, बहेडा, आमला, गिलोय और अडूसा इन सबका क्वाथ बनाकर अथवा

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