भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| चिकित्सा | भाषाटीकासहिता । | ९७१ |
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अजाक्षीरेण गोधूमकल्कं कुन्दुरुकस्य वा ।
प्रलेपनं सुखोष्णं स्याद्ब्रध्नशूलहरं परम् ॥ ११ ॥
गेहूँ अथवा कुन्दुरुको बकरीके दूधके साथ पीसकर मन्दोष्ण लेप करे। इससे ब्रध्नरोग और उसकी अतिशीघ्र पीडा नष्ट होती है ॥ ११ ॥
मृतमात्रे तु वै काके विशस्ते तु प्रवेशयेत् ।
ब्रध्नं मुहूर्त्तं मेधावी तत्क्षणादरुजं भवेत् ॥ १२ ॥
तत्काल मरेहुए कौएके हृदयके मांसको कुछ गरम करके वंक्षणकी सन्धिपर लेप करे तो ब्रध्नरोग और उसकी पीडा तत्क्षण दूर होती है ॥ १२ ॥
अजाजी हबुषा कुष्ठं गोधूमं बदराणि च ।
काञ्जिकेन समं पिष्ट्वा कुर्याद्ब्रध्ने प्रलेपनम् ॥ १३ ॥
कालाजीरा, हाऊबेर, कूट, गेहूँ और सूखे बेरोंको समभाग ले काँजीमें पीसकर लेप करनेसे ब्रध्नरोग नष्ट होता है ॥ १३ ॥
गव्यं घृतं सैन्धवसंप्रयुक्तं शम्बूकभाण्डे निहितं तदेव ।
सप्ताहमादित्यकरैर्विपक्वं हन्यात्कुरण्डं चिरजं प्रवृद्धम्॥ १४ ॥
पुराने गोघृत और सैंधेनमकके चूर्णको शंखमें भरकर सातदिनतक धूपमें रक्खे । पश्चात् इस घृतको कोषोंपर लेप करे तो इससे बहुत पुराना वृद्धिरोग शीघ्र नाश होता है । इसमें सैंधानमक घृतसे चौथाई भाग लेवे ॥ १४ ॥
सैन्धवं च घृताभ्यक्तं ताम्रभाजनमातपे ।
प्रतप्तमूर्णया घृष्टं तन्मलं च समाहरेत् ॥ १५ ॥
कुरण्डं म्रक्षयेत्तेन स निर्विघ्नं दिवानिशम् ।
कुरण्डं तेन संलिप्तं नास्तीत्याह पुनर्वसुः ॥ १६ ॥
ताँबेके पात्रमें घी और सैंधेनोनको भरकर प्रचण्ड धूपमें तपावे । फिर भेडके ऊनसे उक्त पात्रस्थ घृतको घिसे । उससे जितना मल निकले उसको ब्रध्नपर लेप करे । एवं निर्विघ्नपूर्वक नित्यप्रति प्रातः और सायं समय अण्डकोषोंको धोवे और उक्त मलकी मालिश करे तो फिर अण्डकोषवृद्धि नहीं होती ऐसा पुनर्वसु ऋषिने कहाहै ॥ १५ ॥ १६ ॥
गोमूत्रसिद्धां रुबुतैलभृष्टां हरीतकीं सैन्धवसंप्रयुक्ताम् ।
पिबेन्नरः कोष्णजलानुपानं निहन्ति वृद्धिं चिरजां प्रवृद्धाम् ॥