भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ९७२ | भैषज्यरत्नावली । | [ वृद्धिरोग- |
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गोमूत्रमें पकाईहुई हरडको अण्डीके तेलमें भूनलेवे फिर उसमें सैंधेनमकका चूर्ण मिलाकर मन्दोष्ण जलके साथ पान करे । यह औषधि दीर्घकालसे उत्पन्नहुई अण्डवृद्धिको तत्काल नष्ट करती है ॥ १७ ॥
ऐन्द्रीमूलभवं चूर्णं रुबुतैलेन मर्दितम् ।
त्र्यहाद्गोपयसा पीतं सर्ववृद्धिहरं परम् ॥
वचासर्षपकल्केन लेपो वृद्धिविनाशनः ॥ १८ ॥
इन्द्रायनकी जडके चूर्णको अण्डीके तेलमें खरल कर परिमाणमें गोदुग्धकें साथ तीन दिनतक सेवन करे । इससे सब प्रकारका वृद्धिरोग नष्ट होता है अथवा वच और सरसोंको जलमें पीसकर लेप करे तो उक्त रोग शीघ्र दूर होता है ॥ १८ ॥
बहुवारस्य बीजं च पिष्ट्वा तच्चार्द्रकैः सह ।
कुरण्डं नाशयेद्भद्रे लेपनान्नात्र संशयः ॥ १९ ॥
लहसौडेके बीजोंको अदरखके रसमें पीसकर लेप करनेसे कुरण्डरोग नाश होता है । इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ १९ ॥
घृतैर्नीलोत्पलं मूलं पिष्ट्वा लिम्पेत्कुरण्डकम् ।
अथवा लेपनं कुर्याद् गृहमण्डूकशोणितैः ॥ २० ॥
नीले कमलकी जडको घीमें पीसकर लेप करे अथवा घरमें पैदाहुए मेंढकके रुधिरका लेप करे तो अण्डवृद्धिरोग नष्ट होता है ॥ २० ॥
रास्नादि ।
रास्नायष्ट्यमृतैरण्डबलागोक्षुरसाधितः ।
क्वाथोऽन्त्रवृद्धिं हन्त्याशु रुबुतैलेन मिश्रितः ॥ २१ ॥
रायसन, मुलहठी, गिलोय, अण्डकी जड, खिरेंटी और गोखुरू इनके क्वाथकों अण्डीके तेलके साथ मिलाकर पीनेसे अन्त्रवृद्धिरोग तत्काल नष्ट होता है ॥ २१ ॥
त्रिकट्वादि ।
त्रिकटुत्रिफलाक्वाथं सक्षारलवणं,पिबेत् ।
विरेचनमिदं श्रेष्ठं कफवृद्धिविनाशनम् ॥ २२ ॥
सोंठ, मिरच, पीपल हरड, बहेडा, आमला इनके काढेमें जवाखार, सैंधानमक डालकर पीवे । इससे विरेचन होकर कफजन्य अन्त्रवृद्धि नाश होय ॥ २२ ॥