भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1008
९७६भैषज्यरत्नावली ।[ वृद्धिरोग -

स्थलपद्मस्योत्पलस्य सप्तकृत्वो द्रवैःपृथक् ।
ततो रक्तिमिताः कुर्याद्वटीश्चण्डांशुशोषिताः ॥ ४३ ॥
अन्त्रजान्निखिलान्रोगान्सर्वदोषोद्भवांस्तथा ।
हन्त्ययं रसराजेन्द्रो मृगराजो यथा मृगान् ॥ ४४ ॥

सिंगरफसे निकाला हुआ पारा एक तोला, भाँगरेके रसमें शुद्ध कीहुई गंधक एक तोला, सुवर्णभस्म ६ मासे, चाँदीकी भस्म ६ मासे और शीशेकी भस्म ३ मासे लेवे । सबको खरलमें रख अडूसेके क्वाथद्वारा भावनादेवे । तदनन्तर मकोय, चीता, निर्गुण्डी, कुडा, मानकन्द और कमल इनके रसोंसे यथाक्रम अलग अलग भावना देवे । फिर धूपमें सुखाकर एकएक रत्तीकी सुन्दर गोलियाँ बनालेवे । यह रसराजेन्द्रयोग यथाविधि सेवन करनेसे अन्त्रसम्बन्धी अनेक दोषोंसे उत्पन्नहुए सम्पूर्ण रोगोंको इस भाँति नष्ट करता है, जिसतरह मृगेन्द्र मृगोंके समूहको तत्काल नष्ट करदेता है ॥ ४१-४४ ॥

शतपुष्पाद्यघृत ।

शतपुष्पाऽमृता दारु चन्दनं रजनीद्वयम् ।
जीरके द्वे वचा नागं त्रिफला गुग्गुलुत्वचम् ॥ ४५ ॥
मांसी सकुष्ठपत्रैला रास्ना शृङ्गी च चित्रकम् ।
कृमिघ्नमश्वगन्धा च शैलेयं कटुरोहिणी ॥ ४६ ॥
सैन्धवं तगरं चैव कुष्ठं जातीबिसे समे ।
एतैश्च कार्षिकैः कल्कैर्घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ४७ ॥
वृषमुण्डितिकैरण्डबिल्वपत्रभवं रसम् ।
कण्टकार्यास्तथा क्षीरं प्रस्थं प्रस्थं विनिक्षिपेत् ॥ ४८ ॥

सोंफ, गिलोय, देवदारु, लालचंदन, हल्दी, दारुहल्दी, जीरा, कालाजीरा, वच, नागकेशर, त्रिफला, गूगल, दारचीनी, बालछड, कूठ, पत्रज, इलायची, रास्ना, काकडासिंगी, चीता, वायविडङ्ग, असगन्ध, शैलज, कुटकी, सेंधानमक, तगर, कूठ, जावित्री और भसींडा ये प्रत्येक औषधि दो दो तोले लेकर कल्क बनालेवे । फिर अडूसा, गोरखमुण्डी, अण्डकी जड, बेलके पत्ते और कटेरी इनका रस एक एक प्रस्थ एवं गौका दूध और घी एक एक प्रस्थ लेवे । फिर सबको एकत्रकर उत्तम प्रकारसे घृतको पकावे ॥ ४५-४८ ॥