भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 1009

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९७७

सिद्धमेतद् घृतं पीतमन्त्रवृद्धिं व्यपोहति । वातवृद्धिं पित्तवृद्धिं मेदोवृद्धिमथापि वा ॥ ४९ ॥ मुष्कवृद्धिं श्लीपदं च यकृत्प्लीहानमेव च । शतपुष्पाद्यमेतद्धि घृतं हन्ति न संशयः ॥ ५० ॥

इस घृतको प्रतिदिन यथानियम सेवन करनेसे अंत्रवृद्धि, वायुवृद्धि, पित्तवृद्धि, मेदवृद्धि और मूत्रवृद्धि दूर होती है एवं श्लीपदरोग, यकृत् और तिल्ली आदि रोगोंको भी यह शतपुष्पाद्यघृत निस्सन्देह नष्ट करता है ॥ ४९ ॥ ५० ॥

त्रिवृतादिघृत ।

त्रिवृतामधुयष्ट्यम्बुपयोधरयमानिकाः । श्यामाविदारीनिश्रेयापिप्पलीगिरिमल्लिकाः ॥ ५१ ॥ घृतप्रस्थं पयःप्रस्थं दध्याढकसमन्वितम् । शतावरीरसप्रस्थं सर्वाण्येकत्र संपचेत् ॥ ५२ ॥

निसोत, मुलहठी, सुगंधवाला, नागरमोथा, अजवायन, श्यामालता, विदारीकन्द, सौंफ, पीपल और कुडेकी छाल इन सबका समान भाग मिला हुआ कल्क आधसेर, गोघृत और दुग्ध एक एक प्रस्थ, दही १ आढक और शतावरका रस १ प्रस्थ सबको एकत्रित करके विधिपूर्वक घृतको सिद्ध करे ॥ ५१ ॥ ५२ ॥

त्रिवृतादिघृतं चैतदन्त्रजान् निखिलान् गदान् । प्रमेहान्विंशतिं श्वासान्कुष्ठान्यर्शांसि कामलाम् ॥५३॥ हलीमकं पाण्डुरोगं गलगण्डं तथाऽर्बुदम् । विद्रधिं व्रणशोथं च हन्ति नास्त्यत्र संशयः ॥ ५४ ॥

यह त्रिवृतादिघृत अन्न्रजन्य सम्पूर्ण रोग, बीसों प्रकारके प्रमेह, श्वास, कुष्ठ, बवासीर, कामला, हलीमक, पाण्डुरोग, गलगण्ड, अर्बुद्, विद्रधि और व्रणशोथप्रभृति विकारोंको तत्काल नाश करता है। इसमें कुछभी सन्देह नहीं ॥ ५३ ॥ ५४ ॥

बृहतीघृत ।

जलद्रोणे पचेत्सम्यग्दन्त्याः पलशतं भिषक् । पादशिष्टं गृहीत्वेमं क्वाथं सर्पिः पयस्तथा ॥ ५५ ॥ दन्तीमूलं बलां द्राक्षां सहदेवीं शतावरीम् । सरलं शारिवां श्यामां प्रत्येकं कुडवोन्मितम् ॥ ५६ ॥

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