भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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९७८ भैषज्यरत्नावली। [ वृद्धिरोग-

विदार्यास्तालमूल्याश्च शाल्मल्याः कुटजस्य च ।
रसाढकं परिक्षिप्य साधयेन्मृदुनाऽग्निना ॥ ५७ ॥
दन्तीकी जडको १०० पल लेकर ३२ सेर जलमें पकावे । जब पकते २ चतुर्थ भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर यह क्वाथ एवं घी और दूध ८-८ सेर तथा दन्तीमूल, खिरैंटी, दाख, सरदेई, शतावर धूपसरल, अनन्तमूल और श्यामालता ये प्रत्येक १६-१६ तोले और विदारीकन्द, मुसली, सेमलकी मुसली, तथा कुडेकी छालका रस ८-८ सेर लेवे । पश्चात् सबोंको एकत्र मिश्रित कर मन्द २ अग्निद्वारा सम्यक् प्रकार घृतको सिद्ध करे ॥ ५५-५७ ॥
अन्त्रवृद्धिमान्त्ररोगमन्त्रदाहं सुदारुणम् ।
मुष्कवृद्धिं तथा ब्रध्नं व्रणशोथं भगन्दरम् ॥ ५८ ॥
आमवातं वातरक्तं मुखनासाशिरोरुजः ।
रेतःशोणितदोषांश्च हन्ति दन्तीघृतं महत् ॥ ५९ ॥
यह बृहद्दंतीनामक घृत आन्त्रवृद्धि, आन्त्रसम्बन्धी रोग, आन्त्रदाह, दारुण अण्ड-कोषवृद्धि, ब्रध्न रोग, व्रणशोथ, भगंदर, आमवात, वातरक्त मुख-नासिकाशिरके रोग और शुक्र-रक्तसम्बन्धी समस्त रोगोंको नाशता है ॥ ५८ ॥ ५९ ॥

गन्धर्वहस्तकतैल ।
शतमेरण्डमूलस्य पलं शुण्ठ्या यवाढकम् ।
जलद्रोणे विपक्तव्यं यावत्पादावशेषितम् ॥ ६० ॥
तेन पादावशेषेण पयसा तत्समेन च ।
प्रस्थमेरण्डतैलस्य तन्मूलाच्च चतुष्पलम् ॥ ६१ ॥
त्रिपलं शृङ्गवेरं च गर्भे दत्त्वा विपाचयेत् ।
तत्पिबेत्प्रयतः शुद्धो नरः क्षीरान्नभुक् सदा ॥
अन्त्रवृद्धिं जयत्याशु तैलं गन्धर्वहस्तकम् ॥ ६२ ॥
अण्डकी जड १०० पल, सोंठ १०० पल और जौ आठ सेर लेकर अलग अलग बत्तीस सेर जलमें पकावे । पकते पकते जब चौथाई भाग शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर इस क्वाथके साथ दूध ८ सेर, अण्डीका तेल ६४ तोले, एवं कल्कार्थ अण्डकी जड १६ तोले और अदरख १२ तोले मिलाकर यथारीति तेलको पकावे । जब उत्तम रूपसे पककर तैयार होजाय तब घीके चिकने बासनमें भरके रखदेवे । पश्चात् नित्यप्रति प्रातःकाल शुद्ध होकर उपयुक्त परिमाणसे इन तेलको सेवन