भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९९३
धतुरा, अण्डकी जड, सहाळ्ह, पुनर्नवा, सहेंजनेकी जडकी छाल और सफेद सरसों इनको समान भाग ले एकत्र जलमें पीसकर लेप करनेसे बहुत पुराना अतिकठिन श्लीपदरोग नष्ट होता है ॥ २ ॥
निष्पिष्टमारनालेन रूपिकामूलवल्कलम् ।
प्रलेपाच्छ्लीपदं हन्ति बद्धमूलमपि स्थिरम् ॥ ३ ॥
सफेद आककी जडकी छालको काँजीमें बारीक पीसकर लेप करनेसे बद्धमूल और पुराना श्लीपदरोग नाश होता है ॥ ३ ॥
पिण्डारकतरुसम्भववन्दाकशिफा जयति सर्पिषा पीता ।
श्लीपदमुग्रं नियतं बद्धा सूत्रेण जङ्घायाम् ॥ ४ ॥
पिण्डारवृक्षपर उत्पन्न होनेवाले बंदेकी जडको पीसकर घृतके साथ पान करे और उक्त जडको लाल सूतसे जाँघमें बाँध देवे तो अतिप्रबल श्लीपदरोग दूर होता है ॥ ४ ॥
हितश्चालेपने नित्यं चित्रको देवदारु वा ।
सिद्धार्थशिग्रुकल्को वा सुखोष्णो मूत्रपेषितः ॥ ५ ॥
चीतेकी जड और देवदारु अथवा सफेद सरसों और सहेंजनेकी छालको गोमूत्रमें पीसकर कुछ गरम करके लेप करे तो श्लीपदरोग नष्ट होता है ॥ ५ ॥
स्नेहस्वेदोपनाहांश्च श्लीपदेऽनिलजे भिषक् ।
कृत्वा गुल्फोपरि शिरां विध्येत्सच्चतुरङ्गुले ॥ ६ ॥
वातसे उत्पन्नहुए श्लीपदरोगमें स्निग्धपदार्थोंका प्रलेप करके गुल्फ (पाँवकी गाँठ) के ऊपर ४ अंगुलवाली शिराको वेधकर रक्तमोक्षण करे ॥ ६ ॥
गुल्फस्याधःशिरां विध्येच्छ्लीपदे पित्तसम्भवे ।
पित्तघ्नीं च क्रियां कुर्यात्पित्तार्बुदविसर्पवत् ॥ ७ ॥
पित्तजनित श्लीपदमें गुल्फके नीचेकी शिराको वेधकर रुधिर निकाले । फिर पित्तज अर्बुद तथा पित्तज विसर्परोगमें कही हुई पित्तनाशक चिकित्सा करे ॥ ७ ॥
मञ्जिष्ठां मधुकं रास्नां सहिंसां सपुनर्नवाम् ।
पिष्ट्वाऽऽरनालैर्लेपोऽयं पित्तश्लीपदशान्तये ॥ ८ ॥
पित्तज श्लीपदको दूर करनेके लिये मंजीठ, मुलहठी, रास्ना, कटेरी और पुनर्नवा इनको काँजीमें पीसकर लेप करे ॥ ८ ॥
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