भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1026

९९४ | भैषज्यरत्नावली । | [ श्लीपद रोग-

शिरां सुविदितां विध्येदङ्गुष्ठे श्लेष्मश्लीपदे । मधुयुक्तानि वा तीक्ष्णकषायाणि पिबेन्नरः ॥ ९ ॥ पित्तज श्लीपद रोगमें पैरके अँगुठेकी शिराको वेधे और कफनाशक तीक्ष्णद्रव्योंके क्वाथको शहद मिलाकर पीवे ॥ ९ ॥

पिबेत्सर्षपतैलेन श्लीपदानां निवृत्तये । पूतीकरञ्जच्छदजं रसं वापि यथाबलम् ॥ अनेनैव प्रकारेण पुत्रञ्जीवकजं रसम् ॥ १० ॥ पूतीकरञ्जके पत्तोंके रसको अथवा जियापोतेके पत्तोंके स्वरसको सरसोंके तेलके साथ अपनी अग्निका बलाबल विचारकर पान करे तो श्लीपदरोग निवृत्त होता है १०

काञ्जिकेन पिबेच्चूर्णं मूत्रैर्वा वृद्धदारजम् । रजनीं गुडसंयुक्तां गोमूत्रेण पिबेन्नरः ॥ वर्षोत्थं श्लीपदं हन्ति दद्रुकुष्ठं विशेषतः ॥ ११ ॥ विधारेके चूर्णको काँजी अथवा गोमूत्रके साथ पान करे या हल्दी और गुडको गोमूत्रमें मिलाकर पान करे तो एक वर्षके पुराने श्लीपदरोग, दाद और विशेषकर कुष्ठरोग नष्ट होते हैं ॥ ११ ॥

गन्धर्वतैलभृष्टां हरीतकीं गोजलेन यः पिबति । श्लीपदबन्धनमुक्तो भवत्यसौ सप्तरात्रेण ॥ १२ ॥ हरडोंको अण्डीके तेलमें भूनकर गोमूत्रके साथ सात दिनतक सेवन करनेसे श्लीपदरोग दूर होता है ॥ १२ ॥

धान्याम्लं तैलसंयुक्तं कफवातविनाशनम् । दीपनं चामदोषघ्नमेतच्छ्लीपदनाशनम् ॥ १३ ॥ काँजी और कडवे तेलको एकत्र मिलाकर पीनेसे कफ-वातजन्य रोग, आमदोष विशेषकर श्लीपदरोग नष्ट होते हैं और अग्नि दीपन होती है ॥ १३ ॥

गोधावतीमूलयुक्तां खादेन्माषण्डरीं नरः । जयेच्छ्लीपदकेनोत्थं ज्वरं सद्यो न संशयः ॥ १४ ॥ हंसपदीकी जडके १ तोला चूर्णको उडदोंकी इमरतीमें मिलाकर खानेसे श्लीपदसे उत्पन्न हुआ ज्वर शीघ्र नाश होता है ॥ १४ ॥

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