भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९९५


श्लीपदघ्नो रसोऽभ्यासाद् गुडूच्यास्तैलसंयुतः ॥ १५ ॥
गिलोयके स्वरसको कडवे तैलके साथ प्रतिदिन पान करनेसे श्लीपदरोग बहुत जल्द नष्ट होता है ॥ १५ ॥

वृद्धदारकचूर्ण ।

त्रिकटु त्रिफला चव्यं दार्वी वरुणगोक्षुरम् ।
अलम्बुषां गुडूचीं च समभागानि चूर्णयेत् ॥ १६ ॥
सर्वेषां चूर्णमाहृत्य वृद्धदारस्य तत्समम् ।
काञ्जिकेन च तत्पेयमक्षमात्राप्रमाणतः ॥ १७ ॥
जीर्णे च परिहारः स्याद्भोजनं सर्वकामिकम् ।
नाशयेच्छलीपदं स्थौल्यमामवातं च दारुणम् ॥ १८ ॥

सोंठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेडा, आमला, चव्य, दारुहल्दी, बरनाकी छाल, गोखुरू, गोरखमुण्डी और गिलोय ये सब औषधि समान भाग लेकर चूर्ण कर लेवे। फिर समस्त चूर्णके बराबर भाग विधारेका चूर्ण मिलाकर सबको एकत्र पीस लेवे। इस चूर्णको दो तोले प्रमाण लेकर काँजीके साथ सेवन करे। औषधि जीर्ण अर्थात् पचजानेपर इच्छानुसार भोजन करे। यह चूर्ण दारुण श्लीपद, स्थूलता और आमवातादि विकारोंको नष्ट करता है ॥ १६-१८ ॥

पिप्पल्याद्यचूर्ण ।

पिप्पली त्रिफला दारु नागरं सपुनर्नवम् ।
भागैर्द्विपलिकैरेषां तत्समं वृद्धदारुकम् ॥ १९ ॥
काञ्जिकेन पिबेच्चूर्णं कर्षमात्रं प्रमाणतः ।
जीर्णे च परिहारं स्याद्भोजनं सर्वकामिकम् ॥ २० ॥
श्लीपदं वातरोगांश्च हन्यात्प्लीहानमेव च ।
अग्निं च कुरुते घोरं भग्नकं च नियच्छति ॥ २१ ॥

पीपल, त्रिफला, देवदारु, सोंठ और पुनर्नवा ये प्रत्येक औषधि आठ आठ तोलें और सबोंके बराबर भाग विधारा लेवे। फिर सबोंको एकत्र मिलाकर बारीक चूर्ण करलेवे। प्रतिदिन एक तोले चूर्णको काँजीके साथ पान करे। इसके जीर्ण (हज्म) होनेपर यथारुचि भोजन करे। यह चूर्ण श्लीपद, वातजरोग, तिल्ली, भग्नकरोगको दूर करता तथा जठराग्निकी अत्यन्त वृद्धि करता है ॥