भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 1033, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1033

चिकित्सा ] भाषार्टीकांसहिता । १००१

पञ्चवल्कलकल्केन घृतमिश्रेण लेपनम् । यष्ट्याह्वशारिवादूर्वानलमूलैः सचन्दनैः ॥ क्षीरपिष्टैः प्रलेपस्तु पित्तविद्रधिनाशनः ॥ ७ ॥ बड, पीपल, पाखर, गूलर और बेंत इनकी छालको पीसकर घीमें मिलाकर लेप करे अथवा मुलहठी, गौरिसर, दूब, नलमूल और लालचन्दन इनको दूधमें पीस-कर लेप करे तो पित्तकी विद्रधि नष्ट होती है ॥ ७ ॥

इष्टकासिकतालोहगोशकृत्तुषपांसुभिः । मूत्रपिष्टैश्च सततं स्वेदयेच्छ्लेष्मविद्रधिम् ॥ ८ ॥ ईंटका चूण, रेता, लोहेका चुरा, गोबर, भूसी और धूल इन सबोंको गोमूत्रमें मिलाकर गरम करले फिर अण्डके पत्तेपर फैलाकर कफकी विद्रधिमें सुहाता २ निरन्तर स्वेद देवे ॥ ८ ॥

पित्तविद्रधिवत्सर्वां क्रियां निरवशेषतः । विद्रध्योः कुशलं कुर्याद्रक्तागन्तुनिमित्तयोः ॥ ९ ॥ रक्तज और आगन्तुक विद्रधिरोगोंमें पित्तकी विद्रधिकी समान समस्त चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ९ ॥

शोभाञ्जनकनिर्यूहो हिङ्गुसैन्धवसंयुतः । अचिराद्विद्रधीन्हन्ति प्रातः प्रातःनिषेवितः ॥ १० ॥ सहिंजनेकी छालके काथमें हींग और सैंधानमक मिलाकर प्रतिदिन प्रातःकाल सेवन करे तो बहुत शीघ्र विद्रधिरोग नष्ट होता है ॥ १० ॥

शिग्रुमूलं जले धौतं दरपिष्टं प्रगालयेत् । तद्रसं मधुना पीत्वा हन्त्यन्तर्विद्रधिं नरः ॥ ११ ॥ सहिंजनेकी जडको जलमें धोकर पत्थरपर पीसकर वस्त्रमें छानलेवे । फिर उस रसको शहदके साथ पान करे तो अन्तर्विद्रधिरोग नाश होता है ॥ ११ ॥

श्वेतवर्षाभुवो मूलं मूलं वरुणकस्य च । जलेन कथितं पीतमपक्वं विद्रधिं जयेत् ॥ १२ ॥ सफेद पुनर्नवेकी जड और वरना वृक्षकी जडके काथको बनाकर पान करे तो अपक्व (बिनापकी) विद्रधि दूर होती है ॥ १२ ॥

शमयति पाठामूलं क्षौद्रप्लुतं तण्डुलाम्भसा पीतम् । अन्तर्भूतं विद्रधिमुद्धतमाश्वेव मनुजस्य ॥ १३ ॥