भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १००२ | भैषज्यरत्नावली । | [विद्रधि- |
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पाठकी जडको चावलोंके जलके साथ पीसकर एवं शहदमें मिलाकर पीनेसे अन्तर्विद्रधिरोग शीघ्र शमन होता है ॥ १३ ॥
अपक्वे त्वेतदुद्दिष्टं पक्वे तु व्रणवत् क्रिया ॥ १४ ॥
ये सब उपर्युक्त उपचार अपक्व विद्रधिमें कहे हैं अतः उसी अवस्थामें प्रयोग करे। किन्तु पक्व विद्रधिमें व्रणशोथके अनुसार चिकित्सा करनी चाहिये ॥ १४ ॥
स्रुतेऽप्यूर्ध्वमधश्चैव मैरेयाम्लसुरासवैः ।
पेयो वरुणकादिस्तु मधुशिग्रुद्रुमोऽथवा ॥ १५ ॥
अन्तर्विद्रधि विदीर्ण होकर उसमेंसे ऊपर अथवा नीचेको पीब, रक्तादि बहुत हों तो ईखके रसकी मदिरा, काँजी, मद्य और आसव इनको वरुणादि गणकी औषधियोंके क्वाथमें मिलाकर अथवा लाल सहिंजनेके उष्ण क्वाथके साथ पान करे ॥ १५ ॥
वरुणादिघृत ।
सिद्धं वरुणादिगणैर्विधिना तत्कल्कपाचितं सर्पिः ।
अन्तर्विद्रधिमुग्रं मस्तक शूलं हुताशमान्द्यं च ॥ १६ ॥
गुल्मानपि पञ्चविधानाशयतीदं यथाऽम्बु वायुसखम् ।
एतत्प्रातः प्रपिबेद्भोजनसमये निशास्येऽपि ॥ १७ ॥
वरुणादिगणकी औषधियोंके क्वाथ और कल्कद्वारा विधिपूर्वक घृतको पकावे, यह घृत यथानियम पान करनेसे अत्युग्र अन्तर्विद्रधि शिरःशूल मन्दाग्नि और पाँचों प्रकारके गुल्मादि रोगोंको इस प्रकार नष्ट करता है जिस प्रकार जल अग्निको तत्क्षण नष्ट कर देता है। इस घृतको प्रातः मध्याह्न और सन्ध्यासमय भोजनके पश्चात् सेवन करे ॥ १६ ॥ १७ ॥
विद्रधिरोगमें पथ्य ।
आमावस्थे रेचनानि लेपः स्वेदोऽस्रमोक्षणम् ।
जीर्णाः श्यामाककलमाः कुलत्थलशुनानि च ॥ १८ ॥
रक्तशिग्रुश्च निष्पावः कारवेल्लं पुनर्नवा ।
श्रीपर्णी चित्रकः क्षौद्रं शोथोक्तानि च सर्वशः ॥ १९ ॥
विद्रधिकी अपक्व अवस्थामें जुल्लाब देना, प्रलेप, पसीना और रक्त निकलवाना, पुराने समा धान और कलमी धानोंके चावल, कुलथी, लहसन, लाल-