भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१००४ | भैषज्यरत्नावली । | [ व्रणशोथ-
व्रणशोथरोगमें प्रथम विम्लापन (अँगूठेसे तेल लगाकर रगडना) क्रिया करे, दूसरे रक्तमोक्षण, तीसरे उपनाह अर्थात् (पुलटिस बाँधना, प्रलेप, स्वेद और पकानेकी औषधि लगाना), चौथे व्रणको चीरना, पाँचवें दूषित रक्त पीव आदिका शोधन, छठे रोपण (व्रणको भरनेवाली औषधि लगाना) और सातवें विकृतिनाश (अर्थात् व्रणके स्थानमें जो गूथ पडजाती है उसको शारीरिक त्वचाके वर्णमें मिला देना) इस प्रकार व्रणकी चिकित्सा करनेकी ये सात क्रियायें कही हैं ॥ १ ॥ २ ॥
व्रणे श्वयथुरायासात्स च रागश्च जागरात् ।
तौ च रुक् च दिवास्वप्नात्ताश्च मृत्युश्च मैथुनात् ॥३॥
व्रणरोगमें परिश्रम करनेसे सूजन तथा रात्रिमें जागनेसे सूजन और लाली अधिक उत्पन्न होती हैं । दिनमें सोनेसे सूजन, लाली और पीडा एवं स्त्रीप्रसङ्ग करनेसे सूजन, लाली, पीडा और मृत्यु भी होती हैं ॥ ३ ॥
धुस्तूरमूलं सलवणमुष्णं व्रणस्थित्यारम्भे ।
दत्तं लेपान्नियतं व्रणशोथं हरति बहुदुष्टम् ॥ ४ ॥
व्रणकी प्रथमावस्था में धत्तूरेकी जड और सैंधानमकको एकत्र पीसकर गरम करके लेप करनेसे अत्यन्त बढीहुई व्रणकी सूजन निश्चय दूर होती है ॥ ४ ॥
कल्कः काञ्जिकसंपिष्टः स्निग्धशाखोटकत्वचः ।
सुपर्ण इव नागानां वातशोथविनाशनः ॥ ५ ॥
सहोरावृक्षकी छालको काँजीमें पीसकर घीमें मिलाकर प्रलेप करनेसे जैसे गरुडजी सर्पोंको तत्काल नष्ट करदेते हैं उसी प्रकार वातकी सूजन नष्ट होती है ॥ ५ ॥
न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थप्लक्षवेतसवल्कलैः ।
ससर्पिष्कैः प्रलेपः स्याच्छोथनिर्वापणः परः ॥ ६ ॥
“ समभागपिष्टैर्घृतमिश्रैर्लेपः ॥ ”
वड, गूलर, पीपल, पाखर और बेंत इनकी छालको समान भाग लेकर एकत्र पीसलेवे । फिर उसको घृतमें मिलाकर लेप करे तो अत्यन्त वृद्धिगत व्रणकी सूजन दूर होती है ॥ ६ ॥
न रात्रौ लेपनं दद्याद्दत्तं च पतितं तथा ।
न च पर्युषितं शुष्यमाणं नैवावधारयेत ॥ ७ ॥