भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १००५.
शुष्यमाणमुपेक्षेत प्रदाहं पीडनं प्रति ।
न चापि मुखमालिम्पेत्तेन दोषः प्रसिच्यते ॥ ८ ॥
रात्रिमें लेप नहीं करे। यदि लेप कीहुई औषधि नीचे पृथ्वीपर गिरपडे तो फिर उसका लेप नहीं करे। एवं बासी और सूखी औषधिका भी लेप नहीं करे। सूखेहुए लेपको तत्काल छुडादेना चाहिये, क्योंकि सूखाहुआ लेप दाह और पीडा उत्पन्न करता है। व्रणके मुखपर लेप नहीं करे क्योंकि उसके मुखके द्वाराही रस रक्तादि दोष बाहर निकलते हैं। अतः व्रणके चारों तरफ लेप करना चाहिये॥७॥८
रक्तावसेचनं कुर्यादादावेव विचक्षणः ।
शोथे महति संवृद्धे वेदनावति च व्रणे ॥ ९ ॥
यो न याति शमं लेपस्वेदसेकापतर्पणैः ।
सोऽपि नाशं व्रजत्याशु शोथः शोणितमोक्षणात् ॥ १० ॥
एकतश्च क्रियाः सर्वा रक्तमोक्षणमेकतः ।
रक्तं हि व्यम्लतां याति तच्च नास्ति न चास्ति रुक् ॥११॥
व्रणरोगमें अधिकतर बढीहुई सूजन और पीडा होनेपर प्रथम रुधिरका निकालना उचित है। क्योंकि, जो सूजन लेप करनेसे, स्वेद देनेसे, सेकनेसे और अपतर्पणादि क्रियाओंके करनेसे भी दूर नहीं होती, वह एकमात्र रुधिर निकालनेसे तत्क्षण नष्ट होजाती है। व्रणशोथमें अन्यान्य सर्वप्रकारकी चिकित्साओंकी अपेक्षा केवल एकमात्र रुधिरका निकालना सर्वोत्तम चिकित्सा है। क्योंकि रुधिरके दूषित होनेसे फोडे, फुन्सी आदि रक्तविकार उत्पन्न होते हैं, अतः उस दुष्ट रुधिरके निकाल देनेसे तज्जन्यपीडा शीघ्र नष्ट होती है ॥ ९-११ ॥
स चेदेवमुपक्रान्तः शोथो न प्रशमं व्रजेत् ।
तस्योपनाहैः पक्वस्य साधनं हितमुच्यते ॥ १२ ॥
यदि उपर्युक्त क्रियाओंके करनेसे भी सूजन दूर नहीं हो तो उसको प्रलेप, स्वेदादि द्वारा पकाकर छेदन और शोधन कर्म करना हितकारी है ॥ १२ ॥
बालवृद्धासहक्षीणभीरूणां योषितामपि ।
मर्मोपरि च जाते च पक्वे भेदनलेपनम् ॥ १३ ॥
बालक, वृद्ध, असहनशील, क्षीण मनुष्य, डरपोक और स्त्रियोंके उत्पन्नहुए व्रणों एवं मर्मस्थानोंमें उत्पन्नहुए व्रणोंको पकनेपर विदीर्णकारक औषधियोंके लेपसे भेदन करे। शस्त्रद्वारा कदापि छेदन नहीं करे ॥ १३ ॥