भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १००६ | भैषज्यरत्नावली । | [ व्रणशोथ- |
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गवां दन्तं जले घृष्टं बिन्दुमात्रं प्रलेपयेत् ।
अत्यन्तकठिने वापि शोथे पाचनभेदनम् ॥ १४ ॥
गौके दाँतको जलमें घिसकर एक बूँद भर लगादेनेसे अत्यन्त कठिन सूजन तत्काल पककर फूट जाती है ॥ १४ ॥
कटुतैलान्वितैर्लेपात्सपंनिर्मोकभस्मभिः ।
चयः शाम्यति गण्डस्य प्रकोपः स्फुटति द्रुतम् ॥
कपोतकङ्कगृध्राणां पुरीषमपि दारुणम् ॥ १५ ॥
साँपकी केंचलीको अन्तर्धूमवाले पात्रमें जलाकर भस्म करलेवे । उस भस्मको कडवे तेलमें मिलाकर लेप करनेसे अथवा कबूतर, कङ्क और गिद्ध इनमेंसे किसी एककी वीटका लेप करनेसे अत्यन्त दारुण गण्डका समूह नष्ट होता है और व्रणकी गाँठ तत्काल पककर फूट जाती है ॥ १५ ॥
निम्बपत्रं तिलं दन्ती त्रिवृत्सैन्धवमाक्षिकम् ।
दुष्टव्रणप्रशमनो लेपः शोधनकेशरी ॥ १६ ॥
नीमके पत्ते, काले तिल, दन्तीकी जड, निसोत और सैन्धानमक इन सबोंको समान भाग लेकर एकत्र पीस लेवे । फिर शहदमें मिलाकर लेप करे तो दुष्ट व्रण नष्ट होता है । व्रणको शुद्ध करनेके लिये यह अत्युत्कट औषधि है ॥ १६ ॥
एकं वा शारिवामूलं सर्वव्रणविशोधनम् ॥ १७ ॥
केवल एकमात्र सारिवाकी जडको जलमें पीसकर लेप करनेसे सर्वप्रकारके व्रणोंका संशोधन होता है ॥ १७ ॥
सप्तदलदुग्धकल्कः शमयति दुष्टव्रणं लेपात् ।
मधुयुक्ता शरपुङ्खा सर्वव्रणरोपिणी कथिता ॥ १८ ॥
सतौनेका दूध लगानेसे अथवा शरफोंकेकी जडको पीसकर शहदमें मिलाकर लेप करनेसे सर्वप्रकारके दुष्ट व्रण शान्त होते हैं ॥ १८ ॥
मानुषशिरः कपालं तदस्थि वा लेपनं मूत्रेण ।
रोपणमिदं क्षतानां योगशतैरप्यसाध्यानाम् ॥ १९ ॥
मनुष्यके शिरके कपालकी हड्डीको गोमूत्रमें अच्छे प्रकार घिसकर लेप करे । यह प्रयोग जो सैकड़ों उपायोंके करनेसे भी असाध्य होगये हैं ऐसे व्रणोंको तत्काल भर देता है ॥ १९ ॥